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Monday, November 18, 2019

गर्भनाल- लेख १० दिसम्बर २०१९ PSUs


गर्भनाल-लेख  १० -- दिसम्बर २०१९ के लिये

पब्लिक सेक्टरकी भूमिका  
हमारे देशमें सरकारी संस्थाएँ हों या नहीं, विशेषकर सरकारी उद्योग हों या नहीं, यह विगत कुछ वर्षोंसे चर्चाका विषय रहा है। एक ओर पचासके दशकसे स्थापित पीएसयू - पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्ज हैं, उनकी अकार्यक्षमताका रोना है। दूसरी ओर निजीेक्षेत्रके उद्योग हैं, जिनकी क्वालिटी व सेवाओंको लेकर असंतोष है, मंदीके दौरमें वे भी पिस जाते हैं। एक ओर ऑटोमाइझेशनकी आवश्यकता है, दूसरी ओर बढती बेरोजगारीका डर। एक ओर सेंट्रलाइजेशनका तकाजा है तो दूसरी ओर विकेंद्रीकरण सही जान पडता है। इन सबके बीच सही उत्तर क्या हो -- मेरी सेवाकालकी दो घटनाओंमें मुझे उसकी थोडी आहट पकडमें आती है। लेकिन उन्हें समझनेसे पहले संक्षेपमें एक अन्य परिप्रेक्ष्यको समझना होगा।
हमारा देश सहस्त्रों वर्षोंसे कृषि प्रधान देश रहा है। इस देशकी संस्कृतिको ऋषि- कृषि संस्कृति बताते हुए मैंने एक विस्तृत लेख भी लिखा है। अन्य सभ्यताओंमें भी कृषि –आधारित समाज रचना थी लेकिन कृषि व्यवस्था इतनी उन्नत नही थी जितनी भारतमें थी।
विश्वके सारे भूभाग देखे जाये तो हम पाते हैं कि सूर्यकी विपुलता और साथमें जलकी विपुलता, ऋतुचक्र और ऋतुओंकी नियमितता ये तीन वरदान भारत भूप्रदेशके हिस्सेमें जिस बहुलतासे आये वैसे किसी अन्य भूप्रदेशमें नही। इन्हींपर आधारित हमारे व्यापार भी थे, मसाले, खाद्य-पदार्थों की व्यंजना व व्यंजन आदि हमारे व्यापारके भी विषय थे। हमारी तुलनामें अन्य सभी देश इस विषयमें इतने पिछडे थे कि पहली सदीसे लेकर वर्ष १७५० तक वैश्विक जीडीपीमें अकेले भारतका योगदान ३५ प्रतिशत था।
वह तो अंगरेजोंके शासनकी लूटके कारण १९५० तक अर्थात केवल २०० वर्षोंमें ३५ से प्रतिशत घटकर ५ प्रतिशत रह गई। इसका एक कारण था अंगरेजोंद्वारा लगाये गये बडे बडे कर और लगान। लेकिन एक दूसरा भी कारण था। अठारहवीं सदीमें ही इंग्लंडमें औद्योगिक क्रान्तिका आरंभ हुआ जो यूरोपभर फैली और इसका श्रेय उसी सदीसे आरंभ हुए वैज्ञानिक आविष्कारोंको जाता है। यूरोप - जिसे कृषि लायक परिवेश नही मिला है, वहाँ कृषि क्षेत्रकी अपेक्षा औद्योगिक प्रगतिकी दौड आरंभ हुई। कई यूरोपीय देशोंने जैसे ब्रिटेन, पुर्तगाल, स्पेन, हॉलंण्ड आदिने अपने उपनिवेश बनाये थे जहाँसे कर वसूली व प्रकृतिदोहन कर संपत्ति बटोरी जाती थी। इसी दौरमें यूरोपमें शहरीकरण, फॅक्टरी- युनियन, कम्यूनिझम, बडी बडी प्रयोगशालाएँ जैसी कई प्रणालियाँ आरंभ हुई जिन्हें समृद्धिका मापदण्ड कहा जाने लगा।
यही कारण था कि बीसवीं सदिमें जिन जिन उपनिवेशी देशोंमें स्वतंत्रता आंदोलन चले, वहाँ वहाँ आन्दोलनके नेताओंने जनता का रूख स्कूल- क़ॉलेजकी फॉर्मल शिक्षा, शहरीकरण, औद्योगिक प्रगती, ट्रेड-युनियन, साम्यवाद आदिकी ओर मोडा। कहा जा सकता है कि भारतमें तिलक और गांधी जैसे नेताओंने स्वदेशी, कृषि, मिल-उत्पादोंका बहिष्कार, चलो गांवोंकी ओर, बेसिक-शिक्षा जैसे नारे देकर पश्चिमिकरणको थोडा बहुत रोकनेका प्रयास किया। फिर भी पूरी बीसवीं सदिमें औद्योगिक क्षेत्र व सर्विस- सेक्टरका बोलबाला रहा। एक्कीसवीं सदि आते आते लोगोंका ध्यान फिरसे पर्यावरणकी ओर जाने लगा है। आर्थिक समृद्धि नही बल्कि हॅपी लाइफको समृद्धिका मानक माननेकी परंपरा फिनलैण्ड, भूतान जैसे देशोंमें आरंभ हुई है।
इस विस्तृत वैश्विक पटलपर १९५० से २००० तकका भारत कैसा रहा इसे देखना पडेगा। पहले प्रधानमंत्री श्री नेहरू साम्यवादसे प्रभावित थे। उन्होंने रशियाका पंचवार्षिक योजनाओंका मॉडेल अपनाया, साथ ही पीएसयू --– पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग नामक एक विशाल औद्योगिक श्रृंखलाका भी निर्माण किया। अंगरेजोंने सरकारी विभागोंके एकाधिकारमें स्कूल व अस्पताल चलाना, रास्ते व नहर बनाना, रेल व पोस्ट ऑफिस जैसे यातायातके कार्यक्रम चलाना आदि काम आरंभ किये थे। अब उसमें यह नया आयाम जुडा- सरकारी क्षेत्रमें औद्योगिक व्यापारी कंपनियोंका। प्राकृतिक संपदाओंपर सरकारका अधिकार पहलेसेही घोषित था। अब उसीमेंसे देशी कंपनियोंके रॉ- मटीरियल दिया जाने लगा उदाहरण स्वरूप कोयला, बिजली, पानी, डिझेल, बालू इत्यादि। इस प्रकार लायसेंस परमिट कोटा LPQ का राज चल पडा। चालीस वर्ष पश्चात सरकारने अचानक तय किया कि LPQ ही भारतीय अर्थव्यवस्थाके पिछडे रहनेका कारण है और इस नीतिको बदलनेका मंत्र है LPG अर्थात लिबरायझेशन, ग्लोबलायझेशन और प्राइवेटाइजेशन।
मेरे सेवाकालमें १९७५ से १९९० तक पंधरा वर्ष मैंने LPQ का बोलबाला देखा, उसकी अच्छाइयोंके साथ साथ उसकी बुराइयाँ देखीं। उनपर चिन्ता व्यक्त की, लेखन किय़ा और अपनी ओर से उनके कार्यान्वयन व नीतियोंमें सुधारका प्रयास भी किया।
१९८५ में राजीव गांधीने मानों पेण्डुलमके एक छोरसे चल रही LPQ नीतिको पलटकर दूसरे छोर पर LPG के रूपमें ला पटका - बिना किसी तैयारी या प्रशिक्षणके। अगले पंदरह वर्षोंमें उसकी भी अच्छाइयाँ या बुराइयाँ देखी। और दोनोंमें पाया गतिशीलताका व विचारचक्रको चलाये रखनेका अभाव, प्रशिक्षणका अभाव, मॉनिटरिंगका अभाव। पर सबसे बडा पक्ष था सरकारी नीतियोंमें किसी एकात्मिक राष्ट्रीय धोरणका न होना। प्लानिंग कमिशन हर विभाग को कहती कि अपने अपने विस्तारके लिये बजेट बनाओ। और इस विस्तारकी होडमें एक दूसरेसे काम, नीतियाँ व उपलब्धियाँ साझा करनेकी बात कोई नही सोचता था।
ऐसे माहौलमें कुछ घटनाएँ आदर्शके रूपमें मेरे मनमें बस गई हैं जिनमेंसे दो यहाँ उल्लेखनीय हैं।पहली घटना है १९८६ की। तब मैं पुणेमें डब्ल्यूएमडीसी अर्थात वेस्टर्न महाराष्ट्र डेलमेंट कॉर्पोरेशनमें मॅनेजिंग डाय़रेक्टर थी। सांगली जिलाधिकारीके पदसे तबादला होकर मेरी नियुक्ती यहाँ हुई थी लेकिन सांगली जिला मेरे नये पदकी कार्यकक्षामें पडता था। सांगलीमें मैंने देवदासी आर्थिक पुनर्वसनका जो काम आरंभ करवाया था उसके अंतर्गत रेशम-उद्योगमें देवदासियोंका प्रशिक्षण संभव था। इसलिये डब्ल्यूएमडीसीमें आनेके बाद मैंने रेशम- उद्योगके विषयमें थोडा विस्तारसे जानना उचित समझा।
पता चला कि बंगलुरूमें केंद्रिय़ सिल्क बोर्डके कार्यकारी निर्देशक श्री बालासुब्रहमण्यम थे जिनके कार्यकालमें सिल्क बोर्डने तेजीसे प्रगति करते हुए भारतको चीन व जपानकी बराबरीपर लाकर खडा किया था। मेरे बॉस अर्थात् उद्योगसचिव ने कहा - मेरे बॅचमेंट हैं, अपनी दूरदर्शिता, ईमानदारी और अख्खड स्वभावसे जाने जाते हैं, मैं उन्हें बताता हूँ। इस प्रकार मेरी रेशम-यात्रा सुगम हो गई। बंगलुरुमें उनके साथ भेंट संवाद किया, रेशमसे संबंधित कई संस्थाएँ देखनेका प्रबंध उन्होंने किया। मुझे सबसे प्रभावित किया कर्नाटक सिल्क एक्सचेंज बोर्डने। इसकी स्थापना कुछ वर्षपूर्व श्री बालसुब्रहमण्यम् ने ही तब करी थी जब एक पनिशमेंट पोस्ट देने हेतु उन्हें कर्नाटक राज्यके रेशम विभागके डायरेक्टरके पदपर नियुक्त किया गया था।
अपनी समतल भूमि और पानीकी उपलब्धताके कारण कर्नाटक शुरूसे ही रेशम उत्पादनमें आगे रहा है। पहले रेशम उद्योगमें बडी धाँधलियाँ थी। जिन तूतीके पत्तोंपर रेशमके कीडे पलते हैं, वह एक कृषि- उत्पाद है। अर्थात किसान तूतीके पौधे लगाये, रेशमके कीडे पाले और अठाइस दिन उन्हें तूतीके पत्ते खिलाते हुए उनकी देखभाल करे, तभी उसे सुपुष्ट, ६००-७०० ग्राम वजनके परिपक्व रेशमकोष मिलेंगे। अगले तीन दिनोंमें उनका रेशम उतारना पडता है, वरना कीडे कोषसे बाहर आते हुए रेशमको काट डालते हैं। रेशमको उतारनेका काम तकलीपर सूत कातने जैसा महीन व समय खानेवाला काम है जो किसानके बसका नही है।
इस प्रकार रेशम उत्पादक किसानको अपना उत्पाद तत्काल खपाना होता है। इस कारण दलाल, साहुकार व कोषोंके व्यापारी उसे मनमानी प्रकारसे लूटते हैं। रेशमकोषका उचित मूल्य उसे नही मिलता है। यही दलाल रेशम कताई करनेवाली महिलोंको भी अत्यल्प पारिश्रमिक देते हैं। तीसरी प्रकिया होती है धागेको रंगना और वस्त्र बुनना। इन रंगरेज व बुनकरोंको भी कम ही पारिश्रमिक दिया जाता है। अन्ततः इस व्यापारमें जो बडा लाभ दीखता है वह वस्त्र व्यापारीके पास जाता है।
सिल्क डायरेक्टर रहते हुए श्री सुब्रहमण्यम् ने पहले एक कानून बनवाया कि रेशमसे संबंधित कोई भी उत्पाद केवल सरकारद्वारा गठित सिल्क एक्सचेंजोंमें ही बेचे जा सकेंगे। यह उसी प्रकार है जैसे सरकारी नियम है कि आदिवासियोंद्वारा उनके क्षेत्रसे विक्रयहेतु लाये गये उत्पाद केवल ट्राइफेड मंडीमें ही बेचे जायेंगे। अन्यत्र व्यापार होनेपर खरीदारको भारी दण्ड व कारावास होगा। कर्नाटकमें तीन जगहोंपर रेशमकोषके एक्सचेंज और बंगलुरूमें कर्नाटक सिल्क एक्सचेंज बना जहाँ कोष, सूत और वस्त्र तीनोंका क्रय- विक्रय होता था। साथही श्री सुब्रहमण्यम् ने कर्नाटक सिल्क इण्डस्ट्रियल कार्पोरेशन (KSIC) को भी पुनर्जीवित किया।
मेरी दृष्टी में बंगलुरू सिल्क एक्सचेंज सरकारी क्षेत्रकी प्रभाव- क्षमताका एक उत्तम उदाहरण है जिससे ट्राइफेड आदिको कुछ सीखना चाहिये। दोनोंमें अन्तर था KSIC की उपस्थितिसे। एक विशाल नीलामी ह़ॉलमें किसान आपने रेशमकोष बोरियोंमें भरकर लाते। सिल्क एक्सचेंज द्वारा उस दिनका न्यूनतम मूल्य घोषित किया जाता । किसानकी एक एक बोरीकी नीलामी होती जिसमें KSIC भी बोली लगाती। इस प्रकार किसानको अच्छा मूल्य मिल ही जाता। जो किसान उस दिन माल न बेचना चाहे, उसके लिये अत्यल्प भाडेपर रुकनेकी भी व्यवस्था थी या अपना माल भंडारण गृहमें रखकर वह वापस भी जा सकता था। एक तय कीमत पर अपने रेशमकोष बेचनेके लिये वह एक्सचेंजको प्राधिकृत भी कर सकता था। यही व्यवस्था कते हुए सूत, रंगे गये धागे या बुने हुए वस्त्रके लिये भी थी। क्रय-विक्रय के बाद तत्काल संगणकपर कन्नडमें सबका विवरण लिखा जाता और पावतियाँ दी जाती। ऐसे ही रेशमकोषके एक्सचेंज कर्नाटक में अन्यत्र ३ शहरोंमें बने थे। श्री सुब्रहमण्यम् ने प्रतिदिन KSIC की तरफ से १० से २५ प्रतिशत खरीदारी करनेकी सूचना दे रख्खी थी ताकि अन्य व्यापारियोंके लिये अच्छी कम्पीटीशन रहे। लेकिन इन्हीं व्यापारियोंको अंतर्राष्ट्रीय बाजारमें अच्छी सुविधा हो, उनका माल कसौटीपर खरा उतरे, वे नये डिझाइन व संकल्पनाओंपर प्रयोग कर सकें इस हेतु भी श्री सुब्रहमण्यम् ने बडा काम किया था। वही काम अब वे केंद्रिय़ सिल्क बोर्डके पदसे पूरे देशके लिये कर रहे थे।
मैं समझाती हूँ कि यह पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिपका उत्तम उदाहरण है, हालांकि वर्तमानमें PPP का अर्थ अलग हो गया है और वह अर्थ भ्रष्टाचारकी ओर झुकता है। किसी एक पब्लिक सेक्टरमें अन्य किसी प्राइवेट कंपनीकी भागीदारी बना दी जाती है और एक तरहसे वह एक लायसेन्स हो जाता है कि प्राइवेट कंपनी उस पब्लिक कंपनीको खा जाये।
इस उदाहरणसे मैंने यह सीखा कि सरकार यदि किसी उद्योगसे पूरी तरह हट जाये तो निजीक्षेत्रकी धाँधलियाँ नही रुकेंगी लेकिन यदि सरकार भी अपनी थोडीसी उपस्थिति बनाये रखे तो निजिक्षेत्र भी अच्छा काम करेगा। थोडेसे रेग्यूलेशनकी व प्रशिक्षणकी आवश्यकता भी होगी, और सतत रूपसे क्वालिटि अपग्रेडेशनकी मनोवृत्ति भी बनानी पडेगी।सरकारी क्षेत्रमें सेवाओंका प्रतिशत दससे- पच्चीस तक रहे और प्राइवेट संस्थाओंके साथ कभी टक्कर, तो कभी एकत्रित काम ऐसी नीति रहनेपर वह क्षेत्र प्रभावी रूपसे आगे बढ सकता है।
इस संदर्भमें TISCO - टिस्को जमशेदपूरकी यात्रामें वहाँके अधिकारियोंसे सुनी एक कहानी चिन्तनयोग्य है। जब श्री रतन टाटा चेयरमैन बने तो उन्होंने टिस्कोपर बडा विचार किया और पाया कि विश्वकी अन्य स्टील कंपनियोंके सामने टिकनेके लिये कर्मचारी कटौती व ऑटोमेशनकी आवश्यकता है। तो उन्होंने टिस्कोके सारे कर्मचारियोंकी सभामें एक प्रस्ताव रखा कि अगले पांच वर्षोंमें टिस्कोमें आजकी तुलनामें केवल एक तिहाई कर्मचारी चाहिये और उन्हें कुछ नये कौशल सीखने पडेंगे। विशेषकर संगणक द्वारा ऑनलाइन मॉनिटरिंगकी तकनीक ताकि जो नई पद्धतियाँ आयेंगी उन्हें वे ठीकसे संभाल सकेंगे। अतः कर्मचारियों के लिये तीन पर्याय है।–
1) एक बडा आर्थिक गोल्डन हँडशेकवाला पॅकेज लेकर टिस्कोसे विदा हों।
2) किसी भी क्षेत्रमें अगली पढाईका विषय और संस्था चुनकर वहाँ जाइये- टिस्को आपको तीन वर्षकी समुचित स्कॉलरशिप देगी।
3) आप स्वयंका उद्योग खोलकर टिस्कोके कुछ छोटे-मोटे काम अपनी कंपनियोंमें पूरा करें। टिस्को आपके साथ १० वर्ष का करार करेगी।
और यह सब होगा आपसी सहूलियतका ध्यान रखते हुए। जो टिस्कोमें रुकना चाहेंगे उन्हें सारी नई पद्धतियोंमें दक्ष होना पडेगा।
सरकारको भी जब अपने उद्योगोंको सिकोडना हो तो कितना सिकोडे यह कर्नाटक सिल्क एक्सचेंजसे और कैसे प्लान करें यह टिस्कोसे सीखें।
इसे विपरीत कई वर्षोंसे सरकारी योजना सुनती आ रही हूँ कि एयर इंडिया या BSNL को बिना किसी प्लानके बेचा जानेवाला है। उनके पास अपरिमित मूल्यकी जमीनें हैं।उनका नेटवर्क देशके अंदरूनी क्षेत्रोंमें पहुँचा हुआ है। परन्तु उनके स्टाफको न अच्छा प्रशिक्षण है न उत्साहवर्धन, न भ्रष्टाचारके लिये कोई दण्ड। फिर जब उनके मानवी संसाधन निकम्मे हो जायेंगे तब उन्हें औने पौने दामोंमें बेच देना संभव है।ऐसेमें कमसे कम वहाँ कार्यरत ट्रेड युनियन ही आगे आकर कहते कि स्टाफ ट्रेनिंगका काम हम करेंगे। लेकिन उनकी मनोवृत्ति भी अब केवल माँग करनेवाली रही है, संस्थाको आगे बढानेके उत्तरदायित्वमें उनकी कोई साझेदारी अब नही दीखती।
मेरी एक चिन्ता और भी है। हमें नही भूलना चाहिये कि सरकारी उपस्थिति क्रिटिकल समयमें बडे कामकी होती है। अभी हालमें काश्मीरमें धारा ३७० हटानेके बाद इंटरनेट सेवाएँ कुछ कालतक रोकनी पडी थीं। फिर जब बहाली हुई तो सतर्कताके विचारसे पहले कुछ दिनोंतक सरकारने केवल बीएसएनएलपर ही भरोसा किया था, अन्य कंपनियोंपर नही।
मानवीय संसाधनोंका सुनियोजन किसी समाज या राष्ट्रको आगे ले जाता है और उनकी अवहेलना देशकी प्रगतीको कई डग नीचे खींचती है। हमें चुनना होगा कि हम अपने सेवाकालमें क्या करते हैं।
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