मराठीसाठी वेळ काढा

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मराठीत टंकनासाठी इन्स्क्रिप्ट की-बोर्ड शिका -- तो शाळेतल्या पहिलीच्या पहिल्या धड्याइतकाच (म्हणजे अआइई, कखगघचछजझ....या पद्धतीचा ) सोपा आहे. मग तुमच्या घरी कामाला येणारे, शाळेत आठवीच्या पुढे न जाउ शकलेले सर्व, इंग्लिशशिवायच तुमच्याकडून पाच मिनिटांत संगणक-टंकन शिकतील. त्यांचे आशिर्वाद मिळवा.

Sunday, February 3, 2019

भाग - ४ मसूरी की कूल गतिविधियॉं


भाग -
मसूरी की कूल गतिविधियॉं
मसूरी को प्रशिक्षण का घोषित उद्येश्य तो यही था कि सरकारी सेवा में उच्च पदसे ही अपनी नौकरी का आरंभ करनेवाले अधिकारियों को उनके आनेवाले वर्षों के उत्तरदायित्व के लिये तैयार करना। उन्हें बताना कि ग्रामीण स्तरसे लेकर अत्युच्च केंद्र सरकार तक सारे काम कैसे चलते हैं, नीतियॉं कैसी बनती हैं, आदेश कैसे निकाले जाते है, उनका अनुपालन कैसे करवाया जाता है, उनसे मिलनेवाला लाभ कैसे मापा जाता है, इत्यादि। यहॉ के फाउंडेशन कोर्स के लिये आनेवाले अधिकारी प्रशासन (IAS)के साथ साथ विदेश सेवा, पुलिस, वन- विभाग, रेलवे, पोस्ट, कस्टम, इनकम टॅक्स, ऑडिट अण्ड अकाउंटस् , जिओलॉजिकल सर्वे, ऑर्डिनन्स सर्वे आदि एक दूसरे से नितान्त विभिन्न सेवाओँ के लिये चुने गये होते है। उन सबके लिये पहले चार महिनों की एक जैसी प्रशिक्षण व्यवस्था होती थी। क्लासेस में विभिन्न विषयों के साथ विशेषज्ञ भी लेक्चर के लिये आते थे। इनमें मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया या श्री जे पी नाईक जिन्होंने शिक्षा नीति के विषय बिलकुलही दर्जेसे हटकर बात की थी। मेरी अपनी सोच भी कुछ कुछ उन जैसी थी लेकिन उनके व्याख्यान में स्पष्टता थी औऱ उनके अपने प्रयोगों में देखे गये उदाहरणों से उनकी सत्यता भी समझमें आती थी। तभी से शिक्षा संबंधी मेरे विचार पक्के होते गये।
मसूरी मे पढाई से अन्य विषय भी थे। सरकारी शिष्टाचार कैसे निभाया जाता है, नियत मुद्दों पर फॉर्मल भाषण कैसे किया जाता है आदि के अलावा कई उत्सवों में भाग लेने के लिये सभी को उत्साहित किया जाता था। रामलीला, जन्माष्टमी, होली, दिवाली इत्यादि धुमधामसे मनाये जाने थे। लोग नृत्य, गायन, नाटक आदि की तैयारी कर रहे थे। हम कुछ लोगों ने तबके प्रसिद्ध मराठी नाटक के हिंदी अनुवाद पंछी ऐसे आते हैं का मंचन करने का विचार किया, जिसमें मुझे हिरोईन का रोलल करना था जो एक झल्लीसी लडकी थी।

खण्ड - २ मसूरी प्रशिक्षण का आरंभ और मेरा अख्खड बिहारीपन


मसूरी प्रशिक्षण का आरंभ और मेरा अख्खड बिहारीपन
खण्ड -

१३ जुलाई को मसूरी अकादमी पहुंचनेवाले प्रशिक्षणार्थियों में और राजी बिलकुल शुरुआती थे। रिसेप्शनपर पहले कमरा बताया गया और कहा गया कि सामान रखवाकर, आरामसे १ बजे के बाद आना - कई कागजात भरवाने हैं। यहीं मुलाकात होती है अगमचंदसे - अगले वर्ष तक का हमारा पर्सनल अटेण्डण्ट। उसमे जिम्मे लेडीज होस्टेल के छठ कमरे थे और हरेक में चार प्रशिक्षणार्थी। लेकिन पूरे वर्षभर में कभी किसी को एक बार भी शिकायत का मौका उसने नही दिया इसीसे उसकी कर्तव्यदक्षता समझी जा सकती है। पहले ही दिन उसने टिप दी - आपके गरम कपडे और रजाई मसूरी के ठंडक के लायक नही हैं। मै तुरंत रजाई बनाने वाले को और कोट के टेलर को बुलाता हूं। दोपहर में मसूरी मार्केट जाकर दो गरम ल्वेटर खरीद लेना। छातेसे काम नही चलेगा यहॉं रेनकोट चाहिये। इत्यादी।
हमारा एक बडासा कमरा था जिसमे पार्टीशन डालकर दो हिस्से बनाये थे। इस तरफ में और राजी तथा दूसरे हिस्से में ललिता और रुक्मिणी। शाम होते होते पूरा लेडीज होस्टेल भर गया था। घूमने तो देखा कि लडकों वाले साइडमें भी सारे होस्टेल भरे थे। इस मेन बिल्डिंग मे करीब ४०० के रहने की व्यवस्था थी। बाकी करीब ६०० प्रशिक्षणार्थी बाहरी बिल्डिंगो में थे।
उन दिनों सभी सर्विसेस मिलाकर लगभग हजार प्रशिक्षणार्थी हो जाते थे जो सभी एक साथ मसूरी अकादमी में फाउंडेशन कोर्स लिये आते थे। ६ महिने पश्चात् वे अपने अपने सर्विस के अनुसार देशभर में अवस्थित ट्रेनिंग अकादमी में चले जाते औऱ केवल IAS प्रशिक्षणार्थी अगले कोर्स के लिये रह जात। जैसे जैसे वर्ष बीतते हैं, प्रशिक्षणार्थियों की संख्या घटती बढती रहती है।
दोपहर तक हम लोगों ने कई कागजात भरे जिनमे एक ज्वाइनिंग रिपोर्ट भी था। सबको एक टाइप किया कागज पकडाया गया जिसमें एक शपथ लिखी हुई थी। अगली सुबह उसे कक्षामे ले जाना था।
अगली सुबह डाय़रेक्टर श्री राजेश्वर प्रसाद आये। खचाखच भरे हॉलमें सभी चुने हुए अफसरों को शपथ दिलाई गई कि हम संविधान के प्रति एकनिष्ठ रहते हुए देशकी सेवामें पूरा कौशल लगा देंगे। फिर डायरेक्टरने एक लम्बासा भाषण दिया जिसमें उन्होंने स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री के कुछ किस्से सुनाये। वे कभी शास्त्रीजी मेरे व कईयों के हीरो थे। इसलिए वे व्यक्तिगत अनुभव वाले किस्से मनको छू गये। उसी रौ में उन्होंने सबको बता दिया कि सभी को बारीबारी से सप्ताह में दो दिन श्रमदान करना होगा।
धीरेसे बात समझाई गई कि यहॉं की रूटीन बाहुत ही कडी होगी। सुबह पांच बजे या तो घुडसवारी जो IAS IPS के लिये अनिवार्य और बाकी सबके लिये ऐच्छिक थी, या फिर पीटी, या योग, या श्रमदान। फिर नौ बजे से शाम ५ बजे तक लेक्सर्स। बीचमें टी ब्रेक, लंच ब्रेक भी। परिक्षा भी होगी और पास होना अनिवार्य होगा। इसके मार्क के कारण आपकी सिनिऑरिटी आगे पीछे हो सकती है। कईयों को इसका अर्थ समझ नही आया और वे बेपरवाह रहे तो कई दूसरे जी जानसे अधिक नंबर लानेके प्रयास में जुट गये।
पढाई के विषय थे संविधान, पोलिटिकल थियरीज, पब्लिक ,अडमिनिस्ट्रेशन । साथ में क्रिमिनल लॉ कि त्रिविध घुट्टी अर्थान् एविडंस अक्ट, crpc एवं Ipc. इसके अलावा basics of computers , हिंदी बीच बीच में कोई खास खास लेक्चरर्स भी आते तो उनके पाठके स्नॅप टेस्ट इत्यादी ।
क्रिमिनल लॉ पढानेवाले श्री गुरुमूर्ति और उनका तरीका मेरे प्रिय बन गये। वे कभी सेशन्स जज रह चुके थे। मेरी IAS की परिक्षा के लिये भी मैंने कॉण्ट्रॅक्ट अक्ट विषय चुना था और पटना युनिवर्सिटी के कोचिंग क्लासेस में उसे पढानेवाले रमाकान्त जी भी बडे धाकड शिक्षक थेष इन दोनों के कारण मुझे लॉकी अच्छी समझ हुई थी जो पूरी नोकरी भर काम आई।
हिंदी के लिये मुझे व कइयों को छूट मिल चुकी थी। कम्प्युटर्स की पढाई अतीव प्राथमिक थी - उसका अल्गोरिथम और बेसिक या कोबाल्ट जैसी लॅंग्वेजेस, या फिर प्रोग्रामिंग प्रिन्सिपल्स इतने भर तक कम्प्युटर की पढाई थी। इसे पढानेवाले श्री चंद्रशेखर रेलवे इंजिनियरिंग सर्विसेस के अधिकारी थे और रेलवे में संगणक के प्रयास तब अधिकतासें चल रहे थे।
पब्लिक अडमिनिस्ट्रेशन तथा पोलिटिकल थिअरिज - ये दोनों मेरे अप्रिय विषय थे। पब्लिक अडमिनिस्ट्रेशन के क्लास में शुरुआती दिनों में ही मेरा विवाद छिड गया। श्री चारी महाराष्ट्र काडर के एक वरिष्ठ IAS यह विषय पढाते थे। ब्यूराक्रसी के विषय में पढाने लगे ब्यूराक्रसी इम्पर्सनल होती है। मैंने ठोक दिया - नही हो सकती। जो निर्णय लेनेवाला अधिकारी है, उसकी पर्सनल मान्याताएं आदि उसके निर्णय को अवश्य प्रभावित करेंगी। लम्बा विवाद चला। मैं तब भी स्टूडेण्ट और प्राध्यापक की भूमिकानेंही विचार कर रही हूंगी। वरिष्ठ IAS अधिकारी होते होंगे - पर मुझे यह गलत प्रतीत होता है तो शंका समाधान होने तक प्रश्न पूछना औऱ विवाद करना मेरा हक बनता है, यही समझकर मैं बहर करती रही।
यह अख्खडपन एक नितान्त बिहारी गुण है और मराठी गुण भी। तो मुझमें कुछ अधिकतासे ही आ गया है। पूरे क्लासमें जो जो पहलेसे ही पब्लिक अडमिन पढकर आये थे वे कह रह थे - क्यों बहस करती है - यह तो बिलकुल प्राथमिक ज्ञानकी बात है। पर कई लोग मेरा सपोर्ट भी कर रह थे। आखिर क्लास रोककर सबको छुट्टी दी गई जाते हुए उन्होंने इतना अवश्य कहा कि परीक्षा में ऐसा ही उत्तर लिखोगी तो नंबर नही मिलनेवाले। तब कुछ शुभचिन्तकोंने समझाया तुम्हें महाराष्ट्र काडर मिल गया तो यो तुम्हारे सीनियर होंगे - फिर तुम्हें मजा चखायेंगे।
लेकिन यह समझाना बेकार रहा - उस दिनसे आज तक मेरी मान्यता यही है की ब्यूराक्रसी इम्पर्सनल नही हो सकती और होनी भी नही चाहिये। इसमें आने वाले हर व्यक्ति का अपना व्हॅल्यु सिस्टम होता है - अर्थात् अपना नैतिकता का मापदण्ड। उसके व्दारा किया जाने वाला निर्णय तथा काम वह इसी मापदण्ड के आधार से करता है। नियमों के दायरे में रहकर भी वह अपना मापदण्ड लगा सकता है और जब चाहे नियमों के जंजाल से रास्ता निकाल सकता हैइस संबंधमें मेरे कार्यकाल के अन्तिम वर्षो में घटी एक घटना उल्लेखनीय है।
मेरे कार्यालय के दो ऐसे अधिकारी थे जिनकी क्षमता तो थी लेकिन मनोयोगसे काम नही करते थे।मैं काम नही करता - कौन मेरा क्या उखाड लेगा वाला रवैया था। मैने सप्ताह में एक दिन सभी अधिकारीयों के साथ आधा घंटा चाय पर रखा था - तब हम फाइलों की बात नही करते थे। तो एक दिन मैंने सबसे पूछा - यदि कभी आप घरपर परिवार व बच्चों के साथ ऑफिस की चर्चा करते है तो क्या बताते है? या तो आप कह सकते हैं कि देखो में कितना स्मार्ट हूं, सरकार को कितना बुद्धु बनाता हुं, कि बिना पूरा काम किये ही पूरी पगार लेता हू । या आप कह सकते हैं कि आज मेंने अपनी फाइल में ऐसा ऐसा निर्णय लिया जिससे देश एक डग आगे बढा है। दोनों ही कारणों से आप परिवार को कह सकते हैं कि उन्हें आपपर गर्व होना चाहिये।
प्रायः सभीने ना में सिर हिलाया। "नही पहली बात कहकर हम उन्हें गर्वकी भावना नही दे सकते।"
चाय समाप्त हुई - बात आई गई हुई। और अगले दिनसे मैंने महसूस किया कि उन दोनों अधिकारियों के काम करने का तरीका बदल गया था। अदि मैं किसी थी फाइल की या काम की जिम्मेदारी उनपर डाल सकती थी।
काश की हमें पब्लिक अडमिन मैं यह पढाया जाय कि अधिकारियों का पफॉमंस इम्पर्सनल नही होता बल्कि उनको व्यक्तिगत नैतिक मापदण्ड के आधार पर चलता है। जब यह बात समझ में आयेगी और उसी आधार से प्रतियोगी परिक्षाओं में चयन होगा, तब ब्यूराक्रसी में अलग से अडमिनिस्ट्रेटिव्ह रिफॉर्मंस की आवश्यकता नही रहेगी।

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Thursday, October 4, 2018

भाग 3 संस्मरणीय मसूरी प्रशिक्षण

भाग 3
























खण्ड -

मसूरी प्रशिक्षण कई अर्थो में संस्मरणीय एवं आनंददायी था। करीब आधे लोग ऐसे थे जो मेरी तरह सीधा विद्यार्थी जीवन से या एकाच वर्ष की लेक्चररी करके यहॉं आये थे लेकिन लगभग आधे ऐसी भी थे जो जीवन की अगली गतिविधियों अर्थात् अन्य नौकरियॉं आदि करके इसमे आये थे। कई लोग ऐसे थे जो पिछले एक-दो वर्षों में यूपीएससी की अन्य सर्विसेस की परिक्षा पास होकर मसूरी का आरंभिक प्रशिक्षण कर चुके थे लेकिन इस वर्ष IAS में आ गये थे। उन्हें हमारे साथ दुबारा क्लासेस अटेंड करने या परिक्षा देने की आवश्यकता नही थी। सो सुबह पाचसे सात बजे की गतिविधियों के सिवा वे कही नही दिखते थे - उनके लिये ग्रामविकास के कुछ प्रोजेक्ट किय़े जाते थे । लेकिन कई उत्सव खेल प्रतियोगिताए और फॉर्मल दिन सें हमलोग एक साथ हुआ करते थे।
हमें संविधान पढानेवाले प्रो माथुर बादमें एक लीजेण्ड बन गये थे । संविधान के आमुख ( प्रीएंबल) पर ही वे करीब या १० लेक्चर्स लिया करने और विभिन्न उदाहरणों से समझाती कि कैसे उसमें प्रतिपादित आदर्श ही संविधानाची प्रत्येक धारा के लिये दिशानिर्देशक है। उससे मुझे स्मरण आता है की बचपन में मैं जब भी पिताजी के साथ किसी विषय की पढाई करने बैठती तो वे सदा उस पुस्तक के साथ किसी विषय की पढाई करने बैठती तो वे सदा उस पुस्तक के आरंभिक पन्ने खोलकर प्रास्ताविक पढने के लिये कहते। कोई भी पुस्तक लिखते हुए लेखक का उद्देश क्या है, वह किन बातों से प्रभावित होकर पुस्तक लिख रहा है, इत्यादि जानना आवश्यक है और इन्ही बातों को वह प्रास्ताविक में अभिव्यक्त करता है। इसलिये पुस्तक पढने से पहले उसकी प्रस्तावना पढनी चाहिये। यह पिताजी की सीख थी। नोकरी के अंतिम चरण में मुझे एक दो नये कानून बनाने की प्रक्रिया में सहभागी होने का अवसर मिला। तव देखा कि कैसे पहले नये कानून की आवश्यकता और उद्देश लिखे जाते हैं - और उसके पश्चात ही उस कानून की धाराएं लिखी जाती हैं। तब हर बार संविधान की पढाई और उसके आमुख का स्मरण हो जाता था। औऱ प्रास्ताविक पढने की सीख देने वाले पिताजी का भी।
हमे सप्ताह में दो दिन घुडसवारी अनिवार्य थी। लेकिन मै कई हार अतिरिक्त घुडसवारी के लिये भी चली जाती थी। हमारे इन्स्ट्रक्टर श्री नवल सिंह आर्मी से निवृत्ति पश्चात् मसूरी आये थे । कई अधिकारी ऐसे थे जिन्हे घोडोंसे लगाव था। उन्हें अस्तबल में जाकर घोडों का दानपानी, मालिश, सफाई, उनके जीन की सफाई इत्यादी बातें सीखने की इच्छा थी। ऐसे अधिकारी नवल सिंह के विशेष प्रिय थे और इन्हीं मे मेरा भी नंबर था। मैं कोई अति प्रशिक्षित घुडसवार नही बन पाई लेकिन घोडे की चारो प्रकार की चाल, अर्थात वॉक, ट्रॉट, कॅण्टर औऱ गॅलप पर मुझे अच्छी पकड आ गई थी। मेरी एक मित्र थी जलजा । य़ह अकादमी की सबसे ठिंगनी प्रशिक्षणार्थी थी औऱ अक्सर घोडे पर चढने के लिये उसे किसी की सहायता लेनी पडती। तो एक बार नवल सिंहने कह दिया कि अरे इन मॅडम के लिये आगे से सीढी लाया करना। कोई और होता तो चिढ जाता, जैसे कि वाकई कई अधिकारी चिढा करते थे। लेकिन जलजा एक प्रसन्नह्ऋदय व्यक्तिमत्व की धनी तथा अच्छी कार्टूनिस्ट भी थी। अगले दिन नोटिस बोर्ड पर बडासा कार्टून टंगा था जिसमे घोडे को सीढी लगाकर उसपर चढती हुई जलजा जिसके गालों पर आसू टक रहे थे और पास में बडे आकार में नवल सिंह जो कह रहे थे - मॅडम की सीढी संभालो। इस कार्टून में बना जलजा का चेहरा ऐसा था जिसे देखकर कोई भी हसे बिना नही रह सकता था लेकिन नवल सिंह का चेहरा गुस्सेवाला न होकर एक अच्छी भावना रखनेवाले अभिभाव के जैसा था। लंचब्रेक में सबने देखा कि नवल सिंह जलजा के पास आकर उससे अनुमति चाह रहे थे - मेरा इतना अच्छा चित्र आपने बनाया - कृपया आप मुझे गिफ्ट कर दे। उस दिन के बाद सबने देखा की उनकी घुडकियॉं करीब करीब बंद हो गई। कई बार हम गंभीर प्रसंगो में भी अपने पर आई बातो को सहजता से स्वीकार करना सीखे तो ऐसे प्रसंग की बुराई या कटुता टाली जा सकती है। लेकिन इसके लिये चाहिये ऐसा निर्भय ह्रदय जो अपने आपको दूसरों की नही वरन स्वयं की ऑंख से तौलता है।
मसूरी में सारे राष्ट्रीय उत्सव बडे उत्साह से मनाये जाते। हर तैयारी से पहले हमें बताया जाता कि आगे चलकर ऐसे उत्सव आयोजित करने का उत्तरदायित्व हमारे कंधोपर आ सकता हैं अतः हमें इन उत्सवों में भाग लेना चाहिये। ऐसा सबसे पहला उत्सव था पंद्रह अगस्त। इसके लिये नियत हुआ कि अलग अलग राज्यों से आये प्रशिक्षणार्थी अपनी अपनी भाषा के गीत समूहगान के रुप में प्रस्तुत करेंगे। मुझे कहा गया - तुम मराठी ग्रुपमें जाओ। मैंने पूछा हिंदी क्यों नही? या बंगाली क्यो नही - जो मुझे आती है? मुझे बताया - एक प्रशिक्षणार्थी एक ही ग्रुप चुन सकता है।
अनन्तः मैंने मराठी ग्रुपमे ही भाग लिया क्यों कि उस ग्रुप में गानेवाले या चुनी हुई कविता याद रखनेवाले बहुत कम थे। लेकिन इसी उत्सव के समय एक मॉक जणगणना कार्यक्रम हुआ कि किसी की मातृभाषा क्या है। मेरे सम्मुख फिर प्रश्न उठा कि यदि मुझे तीन भाषाए आती है तो मुझे केवल एक को चुनने को आग्रह क्यो किया जा रहा है? मेरी मातृभाषा अर्थात् जिस भाषा में मेरी मॉं बोलती है - वह मराठी है और मुझे उस पर अभिमान भी है। बिहार में पढाई करने पर भी मराठी पर मेरा प्रभुत्व था। हम लोग प्रति वर्ष गर्मियों कि छुट्टियों में महाराष्ट्र जाते थे। मेरे जन्मगाव धरणगाव में मेरे परदादा, दादा व पिता का घर था, वहॉं डेढ - दो मास व्यतीत करते थे। तब में अपने चचरे भाई बहनों के साथ स्कूल जाती और उनकी मराठी पुस्तके पढा करती थी। घरमें पुरा मराठी वातावरण था। मॉं ने अंत्याक्षरी खेलने के बहाने सैकडो मराठी गीत कविताए सिखाई थी। । महाराष्ट्र का तबका अग्रगण्य दैनिक लोकसत्ता हमारे घर पोस्टसे आता था। तीन - चार मासिक पत्रिकाए आती थी। पिताजी तुलसीरामायण के साथ ज्ञानेश्वरी ग्रंथ का पाठ करते थे। ढेरोम मराठी उपन्यास हमारी पढाकू संस्कृति का हिस्सा थे। लेकिन हमने उतनी ही लगने से और कही अधिक गहराई से हिंदी भी पढी थी। स्कूल में विद्यापती पदों पर नाट्य - नृत्य प्रस्तुतियॉं की थी। जयशंकर प्रसाद दिनकर मैथिलीशरण गुप्त आदि राष्ट्रकवियों की कविताएं भी रही हुई थी । रवींद्रमाथ ठाकूर व शरच्चंद्र को हिंदी के साथ साथ बंगाली में भी पढा था। फिर में तीनो भाषाओं की संख्या - वृध्दि क्यो न कहु? किसीने मुझसे कहा - क्या अन्तर पडता है। यदि हिंदी या बंगाली भाषिकों कि सूची मे तुम्हारा नाम न आया? मैने सोचा क्या अन्तर पडता है यदि किसी भी सूची में मेरा नाम नही आया? लेकिन तीनों सूचियों में मेरा नाम आये और मेरे कारण तीनों भाषाओं की संख्यावृद्धि हो तो उन- उन भाषाओंको क्या लाभ है यह तब मेरी समझमें नही आया। शायद किसी को समझमे न आया हो क्योंकि क्या अन्तर पडता है पूछेनवाले तो कई थे लेकिन हॉं अन्तर पडता है कहकर समझानेवाला तब कोई नही था।
बहुत बाद में विश्व की २० प्रमुख भाषाओं की सूची देखी । उसमें हिंदी सहित भारत की अन्य भाषाए भी थीं बांग्ला, पंजाबी, तेलगू, मराठी और तमिल। लेकिन इन्हें तथा अन्य लाखो- करोडों अन्य भाषियों की भी हिंदी आती है। आज हिंदी बोलनेवालों की संख्या से मैथिली, भोजपुरी, मराठी, बंगाली या तमिल बोलनेवालों की संख्या घटा ही जाती है। इससे हम वैश्विक बाजार में अपनी सास व धाक खो देते है। जब व्हॉट्सएप ने सर्वे मे पाया कि इसे प्रयोग में लाने वालों में मराठी का चलन अधिक है तो तुरंत मराठी के लिये कुछ खास सुविधाए निर्माण की गईं। इसीलिये हमारा लक्ष्य होना चाहिये कि भारत की सभी भाषाए विश्वपटलपर धाक जमायें। इसलिये जणगणना में यह पूछा चाहिये कि आप कौनकौनसी भारतीय भाषाए जानते है। ऐसा करने से हम अपनी सभी भाषाओं को विश्वसम्मान दिला सकते है।
खैर, यह तो विषयान्तर गया। लेकिन मैंने यह चर्चा इसलिये की है की पता चले कि मसूरी का यह एक वर्षीय प्रशिक्षण आपको क्या क्या सिखा जाता है औऱ आपके विचारों को कैसे प्रगल्भ करता है।
जल्दीही मसूरी में वर्षा ऋतु आ गई। कडाके के ठंड निर्माण करती हुई बारिश में रात का खाना खा लेने के बाद कोट - रेनकोट आदिसे लैस होकर हो हल्ला मचाते हुए अकादमी से मसूरी के बाजार तक जाना और वहॉं बन रहे गरम गरम गुलाब – जामुन खाना हमारी आदत बन गई। हमारा ८ - १० जनों का ऐसा ग्रुप बन गया जिसके लिये यह एक आवश्यक रुटीन बन गई। उन समविचारी दोस्तों को अभिवादन।
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part 0 BEGINNING


Monday, October 1, 2018

भाग १ लखनऊ स्टेशनसे

लखनऊ स्टेशनसे

लखनऊ स्टेशन की वह दोपहर मेरे मनःपटल पर अमिट भावसे उकेरी हुई है। दिन रहा
होगा ११ जुलाई १९७४। लम्बासा प्लॅटफॉर्म, बेतहाशा भीड, दौडते भागते लोग। उन्हींमेंसे एक
मैं भी। लखनऊ दिल्ली गाडी के आने का समय हो चला था। कुलीसे मैंने कहा था कि भैया,
जनाना डिब्बे में बिठा देना । उसके सिरपर एक होल्डॉल, दो सूटकेस, और एक कंधेसे लटका
थैला। मेरे पास भी एक सूटकेस, एक खानपान का थैला और एक पर्स। उसके पास रखे चार
सामानोंंमें मेरे अगले पूरे वर्ष तक मसूरी में रहनेका इन्तजाम था अर्थात्, कपडे, ओढने-बिछाने,
पुस्तकें, जूते-वूते, गहने-साजश्रृंगार वगैरा सबकुछ ।

गाडीयॉ आती हैं - भीड उमडती है। कोई मुझे बताता है लखनऊ-दिल्ली गाडी दूसरे
प्लॅटफॉर्म पर आ रही है। भीडके साथ मैं भी दौडती हुई, सीढीयॉ चढती उतरती हुई किसी तरह
उस दूसरे प्लॅटफॉर्मपर पहुँचकर जनाना डिब्बा खोजकर उसमें एक खिडकी पकड लेती हूँ। पीछे
बाकी भीड भी डिब्बेमें घुस रही है। अब मुझे सुध आती है कि कुली किधर है यह तो मैंने देखा
ही नही । अब क्या करूँ – उतरुँ या बैठूँ । उतरनेके लिये रास्ता बनाते बनाते भी देर लगनेवाली
है। बारबार खिडकीसे झाँककर देख रही थी । गाडीका सिग्नल पीला हो गया तो मेरी छटपटाहट
बढने लगी। तभी दूरसे वह आता हुआ दिखा। उन दिनों खिडकीयोंपर बार नही लगे होते थे और
खिडकीसे सिर निकालकर दूर तक देखा जा सकता था। वह दिखा तो जानमें जान आई। वह
भागा भागा चला आ रहा था। खिडकी से ही उसने सामान थमाया। कहा - उधर भी एक
जनाना डिब्बा है, मैंने आपको कहा था कि मेरे पीछे आओ- लेकिन आप इधर आ गई – वह
अपनी बूढी आयुका पूरा फायदा उठा रहा था । मैंने उसे पैसे दिये – उतने ही जितने तय हुए थे,
और उसने भी जादा नही मॉंगे। गाडी चल पडी।

अगले कई घण्टोंतक मैं ईमानदारी नामक सामाजिक गुणके निषयमें सोचती रही। वह मेरा
सामान लेकर कहीं निकल जाता या गाडीके चलने तक मुझे खोज ही न पाता तो। लेकिन
जबतक समाजमें ईमानदारी है, तबतक मेरी इस प्रकारकी छोटी मोटी भूलोंके लिये क्षमा है।

जब कुछ देर तक समाज परिशीलन हो गया तो पिछले दस दिनोंके घटनाक्रमने मेरे
मनकी बागडोर थामी और मनने वही पन्ने पलटना आरंभ किया।

मई महिनेमें शादी होकर मैं नई नवेली दुल्हन बनकर कलकत्ता आई थी। यूपीएससीकी
मौखिक परीक्षा एप्रिलमें ही हो गई थी और रिझल्टका इन्तजार था । यदि सिलेक्शन हुआ तो
जुलाईमें ट्रेनिंगके लिये मसूरी जाना पडेगा। हमारी शादी तय होते ही मेरे ससुरजीने गुरुवारके
उपवासका व्रत लिया था, कि मेैं चुनी जाऊँ। यह श्रद्धा भी समाजमें बडी ऊर्जा और संबल भरती
है। इधर मेरी मॉंने भी शनिवारके उपवासका व्रत ले रखा था । सबके आशीर्वाद और मेरी
मेहनतका फल, जूनमें पता चला कि मेरा IAS में सिलेक्शन हो गया है। सुदूर स्थित मेरे
जन्मगाँव धरणगाँवके विधायक तथा महाराष्ट्रमें तत्कालीन रेवेन्यूमंत्री श्री मधुकरराव चौधरीने
दरभंगामें मेरे पिताजीको अभिनंदनका तार भेजा था जो उन्होंने आगे कई वर्षोंतक संभालकर
रखा था। ।

अब मुझे फटाफट हजार काम करने थे। मैं पहले दरभंगा आई जहॉं मातापिता भाईबहन
और मेरा काफी सामान था और जहॉं मैंने बचपनके पंद्रह वर्ष गुजारे थे । फिर पटनाके लेडीज
होस्टेलमें भी मेरा सामान पडा था। मगध महिला कॉलेजमें, जहॉं मैं लेक्चरर थी - वहाँ
औपचारिक पत्र देना था कि आगेसे मैं नही आऊँगी। पटना युनिवर्सिटीसे मेरा PHD का
रजिस्ट्रेशन था । उनसे पूर्वसम्मति मिल चुकी थी कि IAS में सिलेक्ट हुई तो NOC देंगे । वह
लेना था । पटना होस्टेलसे सारा सामान दरभंगा ले जाकर नये सिरेसे अगले एक वर्षके ट्रेनिंगके
लिये सामानकी पॅकिंग करनी थी । थोडी बहुत पैसेकी व्यवस्था करनी थी। और ढेर सारे मित्र-
सहेलियॉं-गुरुजन-परिचितोंसे विदाई लेनी थी । दरभंगाके सीएम कॉलेज जाकर सबसे, और
खासकर फिजिक्स डिपार्टमेंटके प्राध्यापकोंसे मिलना था । मेरे श्रेयमें उनके अध्यापन व
प्रोत्साहनका विशेष महत्व था । सीएम कॉलेजसे पढकर IAS में आनेवाली मैं पहली स्टूडेण्ट
थी।

पर जो काम अनिवार्य था और नही हो रहा था, जिसके बिना सारा कुछ धरा रह
जानेवाला था, वह था यूपीएससीका पत्र – जो नही आ रहा था ।

दरभंगामें पोस्टेड एक सीनियर IAS श्री अडिगे मेरे पिताके मित्र थे । मेरे IAS के लिये
उन्होंने पिताजीको कई बार सलाह दी थी । उन्होंने कहा दिल्लीमें यूपीएससीके कार्यालयमें
जाकर वह पत्र लेना होगा, वरना नियत दिनांकको ज्वाईन न करनेपर मुश्किल होगी । सो मेरा
छोटा भाई सतीश दिल्ली गया और फिर तार व टेलीफोनसे उसने खबर भेजी – दीदीको तुरंत
रवाना करो- १४ जुलाईको ज्वाईन करना है । वह ९ जुलाइकी दोपहर थी – समय बिलकुल
नही था । रेलका रास्ता तय हुआ - १० तारीखको दरभंगासे समस्तीपुर, वहाँसे लखनऊमें गाडी
बदलकर दिल्ली और १२ को दिल्लीसे देहरादून रवाना होना।

अगली सुबह पिताजी मुझे समस्तीपुरतक छोडने आये । अकेले रेलयात्राका यह पहला
मौका नही था । दरभंगा-पटना-मुगलसराय-इटारसी-जलगांव-धरणगांव मार्गपर मैंने पहले कई
बार अकेले यात्रा की थी। पिताजीको भी मेरे निभा लेनेकी क्षमतापर विश्वास था । फिर भी कई
प्रकारसे सूचनाएँ देकर मुझे लखनऊकी गाडीमेंं बिठाया । वहाँसे बीसेक घंटेकी यात्रा करके मैं
लखनऊ पहुँची थी । वहीं प्लॅटफॉर्मकी सुविधाओंका उपयोग कर स्नान भी कर लिया था । उन
दिनों हर स्टेशनपर रेल्वेके साफसुथरे प्रतीक्षालय हुआ करते थे जिनमें सामान्यजन भी सुविधा
लेते हुए अपनी जरूरतें निपटा सकते थे । हर बडे स्टेशनपर स्वादिष्ट पूरी-सब्जी, पीनेका शुद्ध
पानी आदि सुविधाएँ होती थीं । परेशानी थी तो बस ढेर सारे सामानके कारण । लेकिन चलो,
अब तो गाडी पूरे वेगसे दिल्लीको जा रही है।

अगले दिन दिल्ली स्टेशनपर सतीश मुझे लिवाने आया था । यूपीएससीसे सारे जरुरी
पत्र तथा कागजात ले लिये थे। उसके स्कूली मित्र धनंजयके बडे भाई जिन्हें हम नारायणभैया
कहते थे, उनके घर पर पहुँचे । वे भी केंद्र सरकारके राजभाषा विभागमें अधिकारी थे । वहाँसे
दरभंगा, कोलकाता व मुंबईमें समाचार भिजवाया कि अबतक सबकुछ ठीकठाक है।

शामको दिल्ली-देहरादून जानेके लिये मसूरी एक्सप्रेसमें बर्थकी रिजर्वेशन कर रखी
थी - वहॉं स्थानापन्न हुई । सतीश जाकर अखबार, पानी, कुछ फल ले आया । अब वह कुछ
कहनेवाला ही था कि अचानक एक भूचालसा हुआ । मेरी ही तरह ढेरसा सामान लिये तीन
महिलाएँ अंदर आईं और मेरे सामनेवाली सीट पर कब्जा किया । उनकी अनवरत बातें चल
रही थीं । यात्राहेतु दी जानेवाली हिदायतोंका सैलाब आ गया । फिर ट्रेनके चल पडनेकी
आशंकासे एक युवतीको छोड दूसरी युवती तथा एक प्रौढ महिला जो निश्चित उनकी मॉं थी,
दोनों उतर गईं। लेकिन हिदायतें चालू रही । किसी तरह उन्हें रोककर मैंने सहयात्री युवतीसे
परिचय पूछा और लो, उसे भी मसूरी जाना था - उसी मसूरी अकादमीमें IAS प्रशिक्षणके लिये
। सतीशने सबको सुनाते हुए मुझे कहा - हॉं तो दीदी, अब सारी आवश्यक हिदायतें तुमने सुन
ही ली हैं, मेरे कहने लायक कोई अलग बात नही बची । सब हँस पडे और ट्रेन रवाना हुई।

रास्तेमें राजलक्ष्मी से बातें होती रही । वह दिल्लीके उच्च-मध्यमवर्गके परिवारसे थी,
फर्राटेदार तमिल, हिंदी व इंगलिश बोलती थी । उसके पिताजीका देहान्त हो चुका था और
माँने ही उसे बडा किया था और IASका सपना भी दिखाया था । हम एकदूसरेसे अपने
परिवार, पढाई, शौक, मित्रमंडली आदिके संबंधसे बातें करते रहे।

अगली सुबह देहरादूनसे मसूरीके लिये टॅक्सी पकडी । राजीका परिचित एक और प्रशिक्षणार्थी
भी मिल गया जो पोस्टल सर्विसके सिलेक्ट हुआ था। मसूरी अकादमी पहुँचकर ज्वाइनिंग रिपोर्ट
दी । अकादमीके लोगोंने कुछ और भी कागजोंपर हस्ताक्षर करवाये। उनमें किसीपर एक
छोटीसी तनख्वाहका विवरण था । फिर राजीने समझाया कि इस बेसिक सॅलरीमें डीए आदि
अन्य अलाउंस मिलाकर रकम बडी हो जाती है । अच्छा लगा कि कॉलेजमें फिजिक्सके
लेक्चररकी अपेक्षा यह तनख्वाह थोडी ज्यादा थी । लेकिन यह जानकारी मुझे नही, पर राजीको
है यह क्योंकर । उसने कहा कि बडे शहरोंमें ऐसी जानकारी सबको मिलता रहती है - आगे भी
कोई व्यावहारिक मुद्दा हो तो मुझसे सीख लिया करना । यह सरल था क्योंकि संयोगवश मुझे
और राजीको लेडीज होस्टेलमें एक ही कमरा अलॉट हुआ था । मैंने फिर एकबार समाजकी
भलमानसाहतका आभार माना। इस प्रकार एक वर्षके मसूरी ट्रेनिंगकी पूर्वपीठिका तैयार हो
गई।
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Friday, September 14, 2018

मौज दिवाळी अंक १९९७

जमाबन्दीची शतकपूर्ती (तपासले दि १४-०९-२०१८)

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सन् १७५७ मधे ब्रिटिशांनी प्लासीची लढाई जिंकली आणि भारतात पहिल्याप्रथम राज्य कारभाराला सुरूवात केली. तो ईस्ट इंडिया कंपनीचा अंनल होता. लार्ड क्लाइव्डने जमीनीच्या कांटेकोर मोडमापासाठी सर्वप्रथम १७६७ मधे सर्व्हेअर जनरल ऑफ बेंगॉल या पदावर मेजर जेम्स रॅनेल याची नेमणूक केली. हे ब्रिटिश राजवटीतल्या अगदी आरंभीच्या काळापैकी एक ऑफिस ! म्हणूनच आज त्या कार्यालयात "२२५ वर्षे से अधिक काल राष्ट्र की सेवा में तैनात तैनात " असा बोर्ड पहायला मिळू शकतो. नंतर १८१८ मधे सर्व्हेअर जनरल ऑफ बॉम्बे प्रॉव्हिन्स, नंतर मद्रास प्रॉव्हिन्स नंतर .. ऑफ इंडिया अशा तव्हेने नवीन ऑफिसं उघडली गेली. पण सर्व्हेअर जनरलचे मुख्य काम टोपोग्राफिकल नकाशे तयार करण्याचे होते --- म्हणजे समुद्रसपाटीपासून वेगवेगळ्या ऊंचीवर असणारी गाँवे, डोंगर इत्यादिंचे कंटूर्ससकट नकाशे तयार करणे. याच कामाचा एक भाग म्हणून श्री एव्हरेस्ट या .. ने (कार्यकाळ १८३० ते १८४) हिमालयातील सर्वात उंच शिखराची काटेकोर मोजमाप त्रिकोणमितीच्या सहाय्याने सुरू केल्यावरून त्या शिखराला माउंट एव्हरेस्ट हे नाव पडले. १८५३ मधे ही मोजणी पूर्ण केली ती २६००२ फूट भरली. पुढे १६५२ मधे अधिक कांटेकोर पद्धतीने ही मोजणी २६०२८ फूट भरली. यावरून त्यांचा कामाचा बिनचूकपणा लक्षांत येतो.
जमीनीची मोजमाप पार पडल्यानंतर सहाजिकर्च त्यावरील मालकी हक्क तपासणे मालकांकडून महसूल गोळा करणे ही कामे पुढे आली. त्यामुळे सर्व्हेअर जनरलच्या कामापेक्षा वेगळ्या अशा सेटलमेंटच्या कामाला सुरूवात झाली. सेटलमेंट आणि लॅण्ड रेकॉर्डचे कार्यालय महाराष्ट्रात सर्वप्रथम १६०३ मधे निर्माण झाले. त्याची कार्यकक्षा बॉम्बे प्रॉव्हिन्स म्हणजे आताचे नागपुर, अमरावती मराठवाडा वगळता इतर सर्व विभाग --- कोकण, खानदेश, मुंबई, पश्चिम महाराष्ट्र इत्यादि शिवाय गुजरात, कर्नाटकातील कांही जिल्हे आणि सिंध अशी होती. पहिले सेटलमेंट कमिशनर श्री लॉरेन्स असून त्यांचे कार्यालय पुणे येथे होते. सर्व सेटलमेंट कमिशनरांपैकी श्री अॅण्डरसन हे अतिशय गाजलेले असून त्यांनी या पदावर एकूण साडेदहा वर्षे काम पाहिले इतकेच नव्हे तर जमाबंदी (म्हणजे सेटलमेंट) महसूलाचे काम कसे करावे या बद्दल बारकाव्यांसहित अनेविध नियमांची इतरही पुस्तके लिहिली. अॅण्डरसन्स रेव्हेन्यू अॅण्डमिनिस्ट्रेशन मॅन्युअल हा आजही प्रमाणभूत ग्रंथ मानला जातो आणि कोणत्याही जमाबंदी अगर महसूली अधिकाऱ्याला या पुस्तकावरची शंभर मार्काची परीक्षा पास झाल्याखेरीज खात्यात गत्यंतर नसते. असो.



करून मागितली जाते. पण मुळात अशी वारंवार मोजणी वरिष्ठांच्या आदेशा शिवाय) करून देणे हेच चूक आणि त्यांतही एखादा अधिकारी असेल तर त्याच्याकडून हवे तसे नकाशे बनवून घेणारे ही कमी नाहीत

 
परिच्छेद १ ते २६ गोव्यांत अश्विनीने टंकित केले.


स्थळ आणि काळस्पेस अॅन्ड टाइमअगदी मोक्षाची कांस धरणाच्या ऋषींपासून तर आधुनिक विज्ञानवेत्त्यांपर्यंत सर्वांनी यांच महत्व ओळखल होतस्थळ आणि काळाच्या ठळक नोंदी करुन ठेवणारे विषय भूगोल आणि इतिहास यांची महतीही याचसाठी आहेजमीनीचेसमुद्राचेवाऱ्या-पावसाचे तसेच आकाशाचेही नकाशे तयार करुन त्यांचा अभ्यास करण्याचे तंत्र शेकडो हजारो वर्षापासून चालत आलेले आहेत्याचे एक अतीव मोडकळीत गेलेले स्वरुप म्हणजे आताचे पंचांग.  असो.

ब्रिटिशांच्या ईस्ट इंडिया कंपनीने सन १७५७ मधे प्लासीच्या लढाईत भारतात पहिल्यांदा भूप्रदेश जिंकला व पुढे राज्य वाढवण्यास सुरवात केलीराज्यासाठी जमीन महसुल कब्जात हवात्यासाठी जमीनीच्या काटेकोर मोजमापाची घडी बसवायला हवीक्लाइव्हने यासाठी सर्वप्रथम १७६७ मधे सर्व्हेयर जनरल ऑफ बेंगाॉल या पदावर ............  
या प्रक्रियेमध्ये देशातील एका अत्यंत जुन्या संस्थेची सुरुवात झालीती म्हणजे सर्वे आँफ इंडिया स्थापना सन १७६७त्यानंतर महसुलासाठी पुनर्रचित जमींदारी पद्धत सर्वप्रथम बंगाल-बिहारमधे १७९० मधे अंमलात आणलीपुढे ती मद्रास व अवध संस्थानांमधेही लागू केली.

महाराष्ट्रांत सर्वे अॅड सेटलमेंट ची सुरुवात सन १८२७ मधे इंदापूरपासून झाली आणि सेटलमेंट व लॅण्ड रेकॅार्डचे प्रांतीय कार्यालय सन १९०७ मध्ये अस्तित्वात आलेत्यावेळी त्याची कार्यकक्षा मुंबई प्रॉविन्स होतीमात्र ही सेटलमेंट (जमीनीचे नकाशेमोजमाप व मालकी हक्ककरताना इथे चालू असलेली रयतवारी पद्धत बदलली नाहीपुढे १९५१ मधे स्वातंत्र्यानंतर देशातील जमींदारी पद्धत हद्दपार झाली व सर्वत्र रयतवारी लागू झालीसारांश सन १९०७ मधे मुंबई प्रांतासाठीच्या जमाबंदी आयुक्त कार्यालयाची स्थापना पुणे येथे झाली. तेंव्हापासून कोण कोण जमाबंदी आयुक्त झाले त्यांची नोंद आयुक्त कार्यालयात आहे. त्यामधे अॅण्डरसन हे ही एक नाव आहे ज्याने तिथे असताना १९२५-३० या काळात महाराष्ट्र लॅण्ड रेवेन्यू कोड लिहिले. हेच आजही वापरले जाते.  

भारत त्या काळी शंभर टक्के शेतीवर आधारित होताकिम्बहुना ब्रिटनफ्रान्स सकट सगळेच देश जवळ जवळ तसेच होतेयूरोपांत औद्योगीकरणाला नुकतीच सुरुवात झाली होती आणि शेती ऐवजी औद्योगिक अर्थव्यवस्था स्थापन होत होतीसहाजिकच ब्रिटिशांनी कांटेकोर मोजमापाची पद्धत लावतांना प्रामुख्याने जमीनतिची प्रतवारीपर्जन्यमान व पाण्याची उपलब्धताजमिनीतून मिळणारी पिकंमालकी हक्कइत्यादी बाबी सर्वप्रथम हाती घेतल्याजमिनीतून मिळणारा महसूली कर हे राज्याच्या उत्पन्नाच मोठं साधन होतत्यामुळे ब्रिटिश राजवटीत महसुली प्रशासन आणि कलेक्टर ही यंत्रणा अतिशय महत्वाची ठरली.

कामाच्या सोईच्या दृष्टिने महसूली कामांचे दोन भाग पाडले गेले जमाबंदी आणि महसूल-वसूली.जमाबंदी अधिकाऱ्यांचे काम म्हणजे जमिनीचे सर्वे करणेमूळ मालकी हक्क ठरवणेक्षेत्र ठरवणे नकाशे तयार करणेजमिनीची प्रतवारी ठरवणे व त्याप्रमाणे मूळ महसूली कर ठरवून देणे म्हणजेच परमनंट सेटलमेंट करणेहे काम पंचवीस ते पन्नास वर्षातून एकदा करावे असे ठरवून देण्यांत आले.दरवर्षी करवसूली करणेपिकांच्या नोंदी करणेदुष्काळ की सुकाळ ते जाहीर करणेत्यासाठी पीकपहाणी म्हणजे किती पीक येणार आहे त्याचे अंदाज इत्यादी कामे तलाठीतहसिलदारव कलेक्टर या साखळीच्या माध्यमातून केली जाऊ लागलीत्यातच कायदा व सुव्यवस्था राखण्याची जबाबदारी पण कलेक्टरांवर टाकण्यांत आल्यामुळे त्यांना जिल्हा व तालुका पातळीवर मॅजिस्ट्रेट म्हणून पण घोषित करण्यांत आले

जमाबंदी आयुक्तांचे काम म्हणजे जिथे सर्वे झालेले नसतील ते करवून घेणेनकाशे तयार करणेमालकी हक्क रेकॅार्डवर आणणेजमिनीचे वाटप मोजून व आखून देणेमालकी हक्कात बदल झाल्यास त्यांचे रजिस्ट्रेशन करणे व त्यातून शासनाला महसूल मिळवून देणेत्यांचे नामाभिधान सेटलमेंट कमिशनरअॅन्ड डायरेक्ट ऑफ लॅन्ड रेकॅार्डस् अॅन्ड इन्स्पेक्टर जनरल आँफ रजिस्ट्रेशन असे तीन कामांचे द्योतक होतेत्यांच्या स्टाफ मधे क्षेत्र मोजणारेनकाशे आखणारेहद्दीचे तंटे सोडवणारेजमिनीचे वाटप करुन देणारेखरेदी विक्रीचे रजिस्ट्रेशन करणारे अशा वेगवेगळ्या स्तरावरील अधिकारी उदाहरणार्थ सर्व्हेयरजिल्हा भूमि अभिलेख निरीक्षकसबरजिस्ट्राररजिस्ट्रारसुपरिंटेंडेन्ट ऑफ लन्ड रेकॅार्डस् इत्यादी अधिकारी असततिकडे विभागीय आयुक्तकलेक्टरतहसिलदारतलाठी अशी महसूली शासनाची दुसरी फळी असेदोन्ही मिळून जमीन महसूलाचे एकूण काम सांभाळले जात असे.

या सर्व यंत्रणेमार्फत केल्या जााणाऱ्या महसूली कामांमध्ये निरनिरीळ्या काळात कसा फरक पडत गेला ते आपण पाहू या.

जंगल वहिवाट

कोणत्याही जमिनींचा पहिला प्रथम सर्वे केला जातो तेंव्हा त्या जमीनीवर मालकी हक्क काय,इत्यादींबाबत रेकॅार्ड केले जातेतसेच त्या त्या जागेचा सर्व कंगोऱ्यांसकट स्केली नकाशा तयार केला जातो व क्षेत्रफळ काढले जातेजमीनीची प्रत ठरवूनत्यावर महसूल आकारणी ठरवली जातेया सर्व्हेच्या वेळी एखाद्या जमीन तुकड्याच्या मालकीहक्काबाबत कांहीच समजून आले नाहीमात्र त्या जमीनीवर कुणाची तरी वहिवाट आहेअसे दिसले तर सर्व्हेयरने त्या तुकड्याच्या रेकॅार्डवर जंगल वहिवाट अमुक तमुक व्यक्तिची असा शेरा लिहायचा असेहेतू हा की जिथे जिथे जंगल वहिवाट असेल तिथे तहसिलदार किंवा कलेक्टरने शोध घेऊन नेमकी मालकी कोणाची ते ठरवावेप्रसंगी दिवाणी कोर्टात त्याचा निकाल लावून घ्यावा. अगदी सुरुवातीच्या काळात मालकी हक्काबाबत कोणताच पुरावा नसेल पण खूप वर्ष वहिवाट चालू असेल तर अशी अबाधित वहिवाट असणे हेच मालकी हक्काचे लक्षण समजले जाऊन कलेक्टर जंगल वहिवाटीऐवजी त्या माणसाचे नावात मालकी हक्काने अशी दुरुस्ती करत असे. दुसऱ्या व्यक्तिने इतर काही कागदपत्र वा पुरावा दाखवून मालकी हक्काची मागणी केल्यास सर्व पुराव्यांचा शहानिशा करून पुन्हा मालकी हक्क ठरवला जात असे -- प्रसंगी हा निकाल दिवाणी कोर्टाकडून ठरवीन घ्यावा लागे.

यावरून दिसून येते की जंगल वहिवाट हा शेरा फ्क्त नव्याने व प्रथमच सर्वे-सेटलमेंट करायची असेल तरच लागू असतो.

१०मात्र पुढे ही जंगल वहिवाटीची नोंदच पुष्कळशा भ्रष्टाचाराला कारणीभूत ठरू लागलीयाचे कारण असे की मालकी हक्क कोणाचाही ठरला तरी वहिवाटदाराला बेदखल करून खऱ्या मालकाला जमीनीत प्रस्थापित करण्याच तंत्र कोणालाच जमल नाही अगदी आजपर्यंतहीअशा परिस्थितीत जंगल वहिवाटीने का होईनासातबारा उताऱ्यावर नांव लागले की निदान वहिवीटीचा मुद्दा शाबित होतोआणि जमीन कबजात ठेवता येतेअसा हिशोब तयार झालामग सर्व्हेयरने जंगल वहिवीटीने नाव लावावे असे प्रयत्न होऊ लागलेत्यांत साम दाम दंड भेद अशा सर्व नीति वापरल्या जाऊ लागल्या.

११आजही महसूल कायद्याच्या अंमलबजावणीत ही मोठी उणीव राहून गेलेली आहेमुळात दिवाणी कोर्टामध्ये जमीनीच्या मालकी हक्कांच्या प्रश्न लौकर सुटत नाहीअसे म्हणतात की दिवाणी कोर्टांची पध्दत तयार झाल्यानंतर देवाच्या लक्षांत आले की हे वाद कांही एका जन्मात सुटू शकत नाहीत मग त्याने त्यावर उपाय म्हणून पुनर्जन्माची शक्कल काढली आणि माणसाला चौऱ्यांशी कोटी वेळा पुनर्जन्म घ्यावा लागेलमगच मुक्ती मिळेल असा नियम करून टाकलाअशा प्रकारे दीर्घ कालावधीनंतर दिवाणी कोर्टाचा निकाल लागला तरी वहिवाटदाराला बेदखल करून मूळ मालकाला जमीन मिळण्यासाठी महसूल विभागाची साथ हवी व तिथे भ्रष्टाचाराला सुरूवात होते.

महसूली रेकॅार्डचे गृहीतमूल्य प्रिझम्टिव्ह व्हॅल्यू )

१२महसूली रेकॅार्डला एक गृहीतमूल्य प्रिझम्टिव्ह व्हॅल्यू असतेम्हणजे कांय तर महसूलाच्या 
रेकॅार्डवर जे लिहिले असेल ते प्रथमदर्शनी खरे मानून चालायचेत्यांतील चूक इतर पुराव्यानिशी सिध्द झाली तरच तेवढे रेकॅार्ड बाद होतेमहसूली रेकॅार्ड मध्ये बदल करण्याचे अधिकार फक्त हसूली 
अधिकाऱ्यांना म्हणजे तलाठीसर्कल इन्स्पेक्टरतहसिलदारउपविभागीय अधिकारी किंवा कलेक्टर यांनाच असतातत्यामुळे दिवाणी कोर्टात वहिवाटदाराच्या विरूध्द निकाल लागून दुसऱ्या व्यक्तिची 
मालकी सिध्द झालीकोर्टाने तसा निकाल दिला तरी, महसूली रेकॅार्डमध्ये ती नोंद लावून घेण्यासाठी, आधी महसूल अधिकाऱ्यांची मनधरणी करावी लागतेत्यानंतरही वहिवाटदार सुखासुखी आपली वहीवाट सोडून देत नाहीत्याचे उभे पीक शेतात असेल तर कायद्यानेच त्याला मुभा दिलेली असते की पीक तयार होऊन त्याने तोडून नेईपर्यंत त्याला बेदखल करू नयेमग हा लपाछपीचा खेळ सुरू होतो निम्मेपीक कापून त्यांत काही तरी दुसरा पेरा करायचापीक कापणीच्या दिवशीच नागरणी करून नवीन
 पेरणी करायचीदर महिन्याला शेतात काही न काही उभे असेल अशी व्यवस्था करायची इत्यादी.. शिवाय आपली वहिवाट सोडून देऊन खऱ्या मालकाच्या ताब्यात जमीन देण्यांस, कोणीच तयार नसतो त्यामुळे मालकाला गांवचा तलाठीकोतवालपोलीस 
पाटील यांची पूर्वी मदत घ्यावी लागेम्हणजे त्यांची सरबराई करणे आलेआता तर पोलीस पार्टी 
शिवायपान हलत नाहीम्हणजे सरबराईचा खर्च तर वाढलाच पण त्यांत फुकट जाणारा वेळही वाढला.शिवाय आता वहिवाटदार कोर्टांतून स्टे आणतातत्यामुळे त्यांची मालकी नसली तरी वहिवीट 
वर्षानुवर्ष चालू राहू शकतेथोडक्यात कायद्याच्या माध्यमातून लौकर निकाललौकर कारवाईझटपट
न्याय इत्यादी मिळू शकत नाहीमग जंगल राज्य सुरू होतेते आपल्याकडे झालेले आहेपण खुद्द ब्रिटन मध्ये असे का होत नाहीत्यांनी आपल्याकडे महसूल कायद्याची घडी बसवून घायचा प्रयत्न केला पण त्यासाठी त्यांना पूर्ण वेळ मिळाला नाही असे म्हणावे कायते गेल्यावर पुढील पन्नास 
वर्षांत आपण ती घडी नीट बसवावी म्हणून प्रयत्न करू शकलो नाहीत्यामुळे आता पुनब्रिटिशांना 
आणून यावेळी त्यांना निदान हजार वर्षे तरी राज्य करण्याची विनंती करावी कायआज खेडेगावातीलकित्येक जुनी मंडळी या प्रस्तावाला लगेच हो म्हणतील.


१३. सर्व्हेयर्सनी पहीला वहीला किंवा मध्यवधी सर्व्हे करतांना जंगल वहिवीट लिहिण्याचा मुद्दा आता

मागे पडला आहे कारण आता गांवात सर्व्हेच होत नाहीत. महाराष्ट्रांतील सर्व मुलकी गांवांचे प्रथम

सर्व्हे झालेले आहेत. क्वचित प्रसंगी वनखात्याच्या जमीनीत कारणपरत्वे गांवे वसली जाऊन त्या

गांवाच्या थोड्या क्षेत्राचे प्रथम सर्व्हेक्षण करावे लागतेतेवढेच. जे दुसरे तिसरे सर्व्हेक्षण व्हावे असे

ब्रिटिशकालीन नियमात लिहिले होते ते आता होत नाहीत. मात्र जंगलवहिवटाचा प्रश्न संपला नसून
आता तो तलाठ्यांच्या हातात गेला आहे.


१४. शेतकऱ्यांच्या दृष्टिने सर्वांत महत्वाचे महसुली रेकॅार्ड म्हणजे गाव नमुना नंबर ७, ७अ, १२,

(यालाच ड असेही म्हणतात) ८अ, ८ब व ९अ आणि ९ब. नमुना नंबर ७ व ७अ मधे

जमीनीचे क्षेत्रफळ, सारा आकारणी आणि मालकी हक्काची माहीती असते तर त्यालाच संलग्न बारा

नंबरच्या उताऱ्यांमध्ये दर वर्षांच्या पिकाची नोंद असते. या नोंदीमध्ये बदल तलाठ्याने करून चालत

नाही तर त्यावर सर्कल ऑफीसर किंवा त्याहून वरिष्ठ अधिकाऱ्यांनी शिक्का मोर्तब करणे आवश्यक
असते. बदलाची वर्दी मिळाल्यानंतर तलाठी आधी गांव नमुना नं ६ मधे त्याची नोंद घेतो. त्या
नोंद क्रमांकाला फेरफार नोंद मेहणतात. वर्दीची दखल घेऊन वरिष्ठ अधिकाऱ्यांने चौकशी करून
तसा बदल मंजूर झाल्यावरच सातबारामधे बदलाची नोंद होते. त्या नोंदीखाली नमुना नं ६ मधील
नोंदक्रमांकही लिहिला जातो जेणेकरून तपासणी अधिकाऱ्याला कधीही गांवचे रजिस्टर तपासता यावे.
पुढे वरिष्ठ अधिकाऱ्यांच्या चौकशीला वेळ लागू लागला. म्हणून पेन्सिल नोंदीची पद्धत निघाली. खर तर पेन्सिल नोंदीने कुठलाही दावा सिद्ध होत नाही पण वर्षानुवर्षे पेन्सिल नोंदीचे रेकॅार्ड तयार करून घेऊन त्यावरून हुषार लोक कोर्टात व पोलिसांकडे आपल्या वहिवटाचा दावा करू लागले. यामुळे पेन्सिल नोंद हे भ्रष्टाचाराचे व खटलेबाजीचे साधन झाले. शेवटी सन ....             मधे
शासनाने आदेश काढून नमुना नंबर सातला किंवा बाराला पेन्सिल नोंद घेण्याची पद्धत बंद केली.


कूळकायदा
१५. सन १९४८ मध्ये महाराष्ट्र शासनाने कूळ कायदा (महाराष्ट्र कुळ वहिवाट व शेतजमीन

अधिनियम1948) लागू केला. कसेल त्याची जमीन या न्यायाने मूळ मालक बेदखल होऊन अत्यल्प मोबदल्यात कुळांना त्या जमीनी मालकी हक्काने देण्यात आल्या. यापूर्वी नमुना नंबर बारा मध्ये पिकांच्या नोंदी घेतांना कूळ / खंड नावाचे सदर असे, त्याचप्रमाणे मूळ मालकाऐवजी कसणाऱ्याच्या नावाची नोंद असे. त्याचे प्रयोजन उरले नाही , त्या जागी स्वत: अशी नोंद होऊ लागली. थोडक्यात सातबारा उताऱ्यामध्ये वर ( नमुना नंबर सात मध्ये ) आणि खाली ( नमुना नंबर बारा मध्ये ) एकाच माणसाचे नांव लागू लागले. पण कूळ कायद्यात एक असे कलम आहे की कुणी जरी फक्त एक वर्षभर कूळ पद्धतीने जमीन कसली तरी जमीन त्याचीच होईल. त्याचा आधार घेऊन ज्यांना खटलेबाजी करायची असेल अशी हुषार माणसे तलाठ्यांच्या संगनमताने स्वत:चे नांव पिक पहाणीमधे लावून घेऊ लागली. खरे तर कूळ मालकाबरोबर तसा करार झाला असला पाहजे तरच तलाठ्यांने त्याची दखल घ्यावी असे कायदा सांगतो. पण एकदा का आपले नाव पीकपहाणी मधे लागले की त्याच्या जोरावर वर्षानुवर्ष खटला चालवला जाऊ शकतो. बळजबरीने जमीनीवर ताबा घेतला जाऊ शकतो. इत्यादी सर्व कारणांमुळे साम दाम दंड भेद नीती वापरून जमीनी बळकावता येतात. त्यामुळे भ्रष्टाचाराचा उगम कांही थांबेना.

१६. यावर उपाय म्हणून शासनाने अजून एक प्रयत्न करून पाहीला. सन .... मधे असा आदेश काढला की जमीन मालकाशिवाय इतर कोणीही जमीन कसण्याच्या दावा करीत असेल तर त्याची नोंद सात किंवा बारा मधे न घेता एका वेगळ्या रजिस्टरला घ्यावी व तहसिलदाराकडे दर महिन्याला ती नोंदवही पाठवावी. तहसिलदाराने तीन महीन्याच्या आंत त्या नोंदीबाबत चौकशी करून निर्णय घ्यावा. वहिवाटीचा दावा करीत असलेली व्यक्ति आपण कूळ म्हणून कोणताही पुरावा देऊ शकत नसली तर तो दावा चुकीचा ठरवावा. अशी व्यक्ति शेतता वावरताना दिसली तर बळजबरीने शेतात घुसली असा निष्कर्ष काढून तिला बेदखल करावे - लागल्यास पोलिसांची मदत घ्यावी, वगैरे. या काळांत कलेक्टर हा डिस्ट्रिक्ट मॅजिस्ट्रेट व तहसिलदार तालुका मॅजिस्ट्रेट असल्याने पोलिस यंत्रणा त्यांच्या हाताखाली असे व भारतीय क्रिमिनल प्रोसिजर कोडमधील कित्येक कलमांखाली हे अधिकारी पोलिस खात्यामार्फत हुकुमांची अंमलबजावणी करून घेऊ शकत होते. १९७३ नंतर मात्र या दोन्ही म्रजिस्ट्रेटकडील बरेच अधिकार काढून घेतले असल्याने जमीन व्यवहारात अनधिकाराने व दांडगाईने जमीन बळकावणाऱ्याविरुद्ध प्रभावी कारवाई होत नाही.

पण या ही नोंदीचा निकाल लावण्यास तहसिलदार जितका उशीर करतात त्या प्रमाणे वहिवाटीचे पुरावे तयार करण्यासाठी खटलेबाज लोकांना पुरेसा वेळ मिळतो.

शहरीकरण
१७. ही झाली गावांची परिस्थिती आता शहराकडे वळू या. पूर्वी शहरीकरणाचा वेग मंद होता आणि आपली अर्थव्यवस्था सुद्धा शेतीवर आधारीत होती. औद्योगीकरण वाढले तसे शहरीकरणही वाढले आणि जमीनीचा वापर शेतीकडून बिनशेती कडे जास्त होऊ लागला. शहरी लोकसंख्या वाढली त्याहीमुळे जमीनीचा रहीवाशी वापर वाढू लागला. बिगरशेती जमीनीमधे जास्त वेगाने तुकडे पडणे , हद्दी बदलणे, बांधकाम होणे इत्यादी गोष्टी घडू लागल्या. त्यांच्यासाठी जास्त कांटेकोर पणे क्षेत्रमोजणीची गरज निर्माण झाली

१८बिगरशेती जमिनींच्या मालकी हक्काच्या नोंदी सर्व्हे खात्यामार्फत ठेवल्या जातातगांवठाणातील घरांचे रेकॉर्ड देखील तलाठ्याकडे नसून सर्व्हेयर कडेच असते. त्यांना काटेकोर क्षेत्रमोजणीचे वेगळे तंत्र  शिकवलेले असतेएक स्पेशलायझेशनच म्हणा ना प्रत्येक घरासाठी प्रॉपर्टी कार्ड असून त्यामध्ये जागेचे एकूण क्षेत्रबांधलेले क्षेत्रमालकी हक्क इत्यादी नोंदी असतातइथेही मालकी हक्क बदलला  की वर्दी घेऊन आपापली नोंद प्रॉपर्टी कार्डाला लावून घ्यावी लागतेतलाठ्याकडे बदलीची वर्दी आली  की गांव नमुना नंबर ६ नांवाचा रजिस्टर मधे नोंद घेतली जाते व तिच्यावर शिक्कामोर्तब  झाल्यानंतर सातबारावर त्याची दखल घेतली जातेत्याच प्रमाणे रहिवासी प्रॉपर्टीबाबत देखील  व्यवस्था असावी म्हणून शासनाने MLRC च्या कलम १२६  ला पूरक काही नियम केलेत्यामध्ये म्हटले की  प्रॉपर्टी कार्डमधील नोंदींसारखाच  नमूना असणारे एक रजिस्टर किंवा नोंदवही ठेऊन त्यांत वर्दी नोंदवावीत्यावर निर्णय झाल्यानंतर   मगच प्रॉपर्टी कार्डवर ती नोंद घ्यावीमध्यंतरीच्या काळात त्या बदलाशी संबंधित लोकांना नोटिसीसूचना देऊन त्यांचे मत ऐकून घ्यावे इत्यादीहे सर्व नियम पोटनियम मिळून पंचवीस तीस वाक्य  आहेतमूळ नियम इंग्रजी मधे लिहिले गेले शासकीय पब्लिकेशन मग त्याचे मराठी भाषांतर  केलेते करतांना "प्रॉपर्टी कार्ड व प्रॉपर्टीतील बदलांची नोंदवही (रजिस्टर)" या दोन मुद्द्यांची    गल्लत करण्यांत आलीत्यामुळे ज्या सर्व्हेयरने मराठी नियमाबरहुकूम प्रॉपर्टी कार्डाचे रेकॉर्ड  ठेवण्याचा प्रयत्न केला त्यांच्यामधे गोंधळ निर्माण झालाकांहींनी स्वयंप्रेरणा वापरून प्रॉपर्टी नोंदवही व्यवस्थित व वेगळ्या पद्धतीने ठेवलीपण खूप जणांनी वर्दीच्या नोंदीत्यामधील दावा आणि  प्रतिदावानिर्णय इत्यादी सर्वच नोंदी मूळ प्रॉपर्टी कार्डला ठेवल्या त्यामुळे कोर्टकचेऱ्या वाढल्यात्यांतूनही कांही प्रमाणात भ्रष्टाचार झाले१९९६ मधे जमाबंदी आयुक्तांनी परिपत्रक काढून या बाबत  इंग्रजी नियम पाळावेत व मराठी पब्लिकेशन मधील नियम चुकीचे आहेत त्याप्रमाणे वागू नये असे सर्वांना सूचित केले आहे. पण त्याबाबत अजून शासकीय कारवाई झालेली नाही. या एकूण विवरणाचे महत्व यासाठी की प्रॉपर्टी कार्डच्या उताऱ्याला एक दर्शनी मूल्य (प्रिझम्टिव्ह व्हॅल्यू) असते.
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पूर्वी गांवाचे आणि शहरांचे जमीनीचे रेकॉर्ड दोन पद्धतीने ठेवले जाते. शहराच्या हद्दीमधील सर्व जमीन बिगरशेती विशेषतः रहिवासी वापरासाठी असते. क्वचित कांही ठिकाणी मोठया बागा किंवा शेतजमीनी असतात. मात्र सुमारे ९०-९५ टक्के वापर बिनशेतीसाठी असते. त्यामुळे शहराच्या हद्दीतील सर्व जमीनींच्या नोंदी सिटी सर्व्हे अधिका-या मार्फन ठेवल्या जातात गांवातील बव्हंशी जमीन शेतीची असे त्या जमीनींच्या नोंदी तलाठी ठेवतात मात्र गांनामधे जे गावठाण म्हणजे पूर्वतः रहिवासी क्षेत्र असते तिथल्या नोंदी देखील सिटी सर्व्हे अधिकारीच ठेवतात. शेतजमीन नोंदीसाठी गांव नमुना नंबर सात-बारा तर गांवठाण किंवा शहरी जमीनींसाठी प्रापर्टी कार्ड वापरले जाते. शेतजमीनीच्या मालकीहक्कांत बदल झाला की संबंधित व्यक्ति तलाठयाकडे वर्दी देतात. या वर्दीसाठी एक रजिस्टर ठेवण्यात येते ज्याला गांव न.नं. सहा किंवा '' रजिस्टर असे म्हणतात. या रजिस्टर मधे तलाठी आलेल्या वर्दिची नोंद घेतो, सर्व संबंधित व्यक्तिंना होऊ घातलेल्या बदलाची नोटिस देतो, आवश्यक ते कागदपत्र जोडून घेतो मग एखाद्या वरिष्ठ अधिकारी या सर्व कागदपत्रांवरुन खात्री करुन ड रजिस्टर मधील नोंदीवर 'योग्य मंजूर' असा शिक्का मोर्तब करतात. त्यानंतरच बदलाची नोंद न.नं. सात बाराळा घेता येते. रहिवासी जागेच्या मालकी हक्का मधे जेंव्हा बदल होतो तेंव्हा सिटी सर्व्हे खात्याने हीच पद्धत वापरवी असे MLRC च्या कलम १२६ मधे म्हटले आहे व यासाठी कलम १२६ त्न पूरक कांही नियम केले आहेत. नियम २० ते २८ मधे म्हटले आहे की मालकी हक्कातील बदलाची वर्दी मिळत्यावार सि... ने सर्वप्रथम ती वर्दी एका रजिस्टरला नोंदवावी. याला प्रॉपर्टी कार्ड रजिस्टर असे. म्हणावे मग नियमानुसार सर्व कागदपत्र तपासून तसेच संबंधितांना नोटिसा काहून समरी इम्क्वायरी पद्धतीने बदलाची खामी परवून घ्यावी व नंतरच सदरहू बदलाची नोंद प्रत्यक्ष प्रॉपर्टी कार्डावर करावी. थोडक्यांत तलाठया कडील जो सात बारा तसेच सिसअ कडील प्रॉपर्टी कार्ड आणि तलाठयाकडील जसे गांव न नं सहाचे रजिस्टर तसेच सिसअ कडील प्रॉपर्टी कार्ड रजिस्टर मात्र या मधे भल्याभल्यांचा गोंध उडवणारी एक बाब आहे. गाव न.नं. सात-बारा आणि रहा दिसायला अगदी वेगवेगळे असतात व त्यांतील फरक चटकन ओळखता येतो. या उलट नियम २० असे सांगतो की प्रॉपर्टी कार्ड रजिस्टर थेट प्रॉपर्टी कार्डच्या नमुन्यातच ठेवावे. त्यामुळे दोन्हीं उतारे बधणा-याची गल्लन होते. प्रॉपर्टी कार्ड रजिस्टर मधील नोंदीची चौकशी पूर्ण होई पर्यंत त्या नोंदीला कांहीही अर्थ नसतो या उलट प्रॉपर्टी कार्डावरील नोंदीला गृहीत मूल्य असते.


याहून मोठा गोंधळ शासनाच्या प्रकाशन विभागाने केला आहे. कलम १२६ खाली तयार केलेल्या नियमांचे मुद्रण व प्रकाशन इंग्रजी भाषेमधे सर्वप्रथम १९७२ मधे करण्यांत आले असून त्यामधे 'प्रॉपर्टी कार्ड' 'प्रॉपर्टी कार्ड रजिस्टर' हे दोन शब्दां योग्य त्या ठिकाणी बिनचूक वापरले आहेत. मात्र त्यांचे मराठी भाषांतर करुन ते १९७५ मधे प्राकाशित केले आहे त्यांत मात्र 'मालभत्ता कार्ड' 'मालभत्ता कार्ड नोंदवही' या दोन शब्दांची गळ्ळत केली आहे. नियम २४,२६ व २७ मधे जिथे 'मालमत्ता कार्ड नोंदवही' असे शब्द असायला पाहिजे होते तिथे 'मालभत्ता कार्ड' असे शब्द वापरले आहेत.


पोटहिस्से आणि फाळणी


१९जमाबंदी आयुक्तांमार्फत ठराविक काळानंतर पुन:सर्वेक्षण व्हावे अशी कल्पना होती व तिची अंमलबजावणी झाली नाहीमात्र त्या कार्यालयाचे दुसरे एक काम अविरतपणे चालू असतेते म्हणजे फाळणी आणि पोटहिस्से पाडण्याचे कामया कामाची पद्धत ठरवून देतांना इंग्रज अधिकाऱ्यांनी आर्थिक बोझाचा विचार सातत्याने केलास्टाफ वाढवण्यावर त्यांचा भर नव्हतादूरवरच्या गावांना पायपीट करत जाऊन फक्त एखादी हिस्से पडल्याची केस मोजून देणे परवडण्यासारखे नव्हतेम्हणून अशी पद्धत ठरवण्यांत आली की कुठल्याही जमिनीचे मालक आपापसात नजरअंदाजाने हिस्से पाडतीलतेंव्हा त्याची वर्दी तलाठ्याकडे देण्यात येईलतलाठी गा..नं.६ मधे त्याची नोंद घेईलत्याच प्रमाणे गांवात एक कच्चे हिस्सेबुक किंवा फाळणी बुक ठेवले जाईल त्यावर तलाठी अंदाजाने एक कच्चा पण बिगर स्केली नकाशा तयार करेलत्यावरून पडलेल्या हिश्श्यांची थोडीफार कल्पना येऊ शकेलअसे वर्षभर त्या गावात पडलेल्या सर्व हिश्श्यांच्या नोंदी तलाठ्याकडे साठल्यानंतर जिल्हा भूमि अभिलेख निरीक्षकांकडे त्यांचे स्टेटमेंट पाठवले जाईलत्यावरून एकूण अंदाज घेऊन फाळणी पथकाचा दौरा ठरवला जाईलत्या एकाच चार पांच दिवसांच्या दौऱ्यांत सर्व फाळण्या व्यवस्थित मोजून त्यांचे स्केली नकाशे तयार करून क्षेत्र मोजून दिले जाईलयाला पार्टीशन बाय मीटस् अंड बाऊंडस असे नाव पडलेमराठीत आपण याला मोजणीसंमत हिस्सेवारी म्हणतोही झाल्याखेरीज गावतलाठ्याकडील हिस्सेबुकाच्या नोंदी किंवा नकाशा ग्राह्य धरत नसत व त्यांचे खरेदी विक्री व्यवहार करण्यावर देखील बंदी होतीबंदीचा अर्थ एवढाच की तलाठ्याने किंवा रजिस्ट्रेशन खात्याने त्या खरेदी विक्रीची नोंद करायची नाहीत्यामुळे गांव नमुन्यावर मालकी मूळ मालकाचीच दिसत असेमात्र एका मालकाने दुसऱ्याच्या ताब्यात जमीन दिली आणि त्याच्याकडून पैसेही घेतले व सरकारी दप्तरी नोंद न झाल्याने दोघांचे काहीच विघडत नसेल तर अशा खरेदी विक्रीवर कोण बंधन घालू शकेलत्यामुळे खरेदी विक्री करणारे करत ‍‍मग मोजणीसंमत नोंद होण्याला वेळ लागला की रजिस्ट्रेशन खात्यांत व तलाठ्याला पैसे देऊन गांवरेकॉर्डला नोंदी लावणे सुरू झालेत्यामुळे आपापसात पाडलेले हिस्से मोजणीसंमत करुन घेण्याची गरज संपली अशी भावना पसरलीत्यातून पुनमोजणीचे रेकॉर्ड म्हणजेच सनद करून दिली की त्या त्या मालकाकडून सनद फी वसूल करायची असतेती न झाल्यास जमाबंदी खात्याच्या नांवाने तेवढी कर्तव्यपूर्ती झाली नाही असे चित्र उभे राहतेमग खूप लोक ही फी द्यावी लागू नये म्हणूनही पोटहिस्सा मोजणी करून घ्यायचे टाळू लागलेतलाठीही त्याचा रिपोर्ट करेनासे झाले, कारण सनद फी वसूलीची जबाबदारी तलाठ्याचीचइतके असूनही सुमारे १९७६ पर्यंत पोट हिश्श्याचे काम व्यवस्थित होत असेत्यानंतरच्या काळात हे हळू हळू दुर्लक्षित होत गेले. 


२०पोटहिस्सा मोजणीइतकेच जमाबंदी खात्याचे दुसरे महत्वाचे काम म्हणजे जमीनीच्या हद्दी आखून देणेविशेषतवाद असतील तेंव्हा क्षेत्रफळावरून हद्दी किंवा हद्दीवरून क्षेत्रफळ ठरवणे असे दोन्हीं प्रकार करता येऊ शकतातसाधारणपणे फक्त पहिल्याच मोजणीच्या वेळी हद्दीवरून क्षेत्रफळ ठरवतातत्यांनंतर मालकी हक्काचे खरेदी-विक्री साठी क्षेत्रफळाच्या नोंदीचा वापर होत असल्याने तेच प्रमाण मानून वाद झाल्यास क्षेत्रफळावरून हद्दी आंखून दिल्या जातातयाबाबत महाराष्ट्रांतील पद्धती पेक्षा कर्नाटकांतील पद्धत जास्त चांगली आहेआपल्या पद्धतीतून वाद विवाद व तंटे लौकर सुटू शकत नाहीतकारण आपल्याकडे जमीनीचा नकाशा आखून देणाऱ्यां सर्व्हेयरने त्या नकाशाचे क्षेत्रफळ किती भरते ते काढून दिले तर ती घोर चूक ठरते की काय अशी जमाबंदी खात्यातील प्रवृत्ती आहेत्यामुळे नकाशावरून एखाद्या गणितज्ञाने काढलेले क्षेत्रफळ वेगळे असू शकते आणि खरेदी व्यवहारात मांडलेले क्षेत्रफळ वेगळे असू शकतेत्यासाठी तलाठी किंवा सर्व्हेयर यांपैकी कोणाचीही जबाबदारी नसते व हा प्रश्न नेमका कोणत्या ऑफिसरच्या पातळीवर सोडवला जावा याबाबत कोणाचेही एकमत किंवा सरकारी स्पष्ट आदेश नाहीत. याउलट कर्नाटकात हद्दी आखून देणारा सर्वेयरच तिथल्या तिथे गणित करून हद्दीप्रमाणे क्षेत्रफळ किती भरले व ते खरेदीतील क्षेत्रफळाशी जुळले ना हा तपशील खातेदाराला लगेच देतो त्यामुळे संशयाला जागा रहात नाही व पुढील कित्येक खटले वाचतात.




२१दोन शेजार शेजारच्या जमीन मालकामधे जमीमीच्या हद्दीबाबत वाद उद्भवला तर सर्व्हेयर मार्फत हद्द मोजणी करून घेण्याची पद्धत आहेतसेच कोणाला आपल्या जमीनीचा बिनशेती वापर करायचा असेलबिशेषतत्यांत बांधकाम करायचे असेल तर आधी आपल्या जमीनीच्या हद्दी सर्व्हेयर कडून आखून घ्याव्या लागतातअशी ह्द्दमोजणीची कामे हजारोंच्या संख्येने जमाबंदी कार्यालयाकडे येत असतातत्या साठी संबंधितांनी फी भरावी लागतेतसेच ज्या जमीनीची हद्द मोजणी करून मागायची त्या जमीनीशी आपला कांही अर्था अर्थी संबंध आहे हे सिद्ध करणारे कागदपत्र पण दाखल करावे लागतातत्याही नंतर मोजणीच्या कामाला खूप वेळ लागतोम्हणून मग ज्यादा फी घेऊन तातडीच्या मोजणीची किंवा अति तातडीच्या मोजणीची सोय असे उपाय निघालेपण ते निष्कळ ठरलेमुंबई पुणे सारख्या मोठ्या शहरांत एक हजार स्वेअरफूट जमीनीची किंमत दोन लांखापेक्षा जास्त असतेत्याची साधी मोजणी फी शंभर रूपयेतातडी फी पाचशे आणि अती तातडीची आठशे रूपये आहेदोन लाखाच्या जमीनीचा व्यवहार करणार्याला या रकमेची काय मतब्बरी मग सगळेच अती-तातडीची मागणी करतात आणि पुनकामे रेगाळतातमग सर्व्हेयरला किंवा वरिष्ठांना टेबलच्या आतून बाहेरून पैसे देऊन काम करून घेणे हे प्रकार सुरू होतात.

२२तुकडेबंदी कायदा
आपल्याकडील कित्येक कायदे पुढील पन्नास शंभर वर्षाचा विचार न करता केले जातात आणि काळाच्या ओघांत त्यांचे दुष्परीणाम वाढले तरी त्यावर पुनर्विचार करण्याचे भान व क्षमता कोणाला उरलेली नसते असेही दिसून आले आहेयाचे एक ठळक उदाहरण म्हणजे तुकडेबंदीचा कायदायाचे लांबलचक नांव आहे कन्सॉलिडेशन ऑफ लॅन्ड अँण्ड प्रिव्हेंशन ऑफ फ्रॅगमेंटेशन अँक्टत्यावरुन या कायद्याची दोन उद्दिष्ट लक्षात येतात शेतजमीनीचे छोटे छोटे तुकडे असतील तर शेतकऱ्याला त्यातून चांगला नफा मिळू शकत नाहीम्हणून शक्य असेल तिथे शेतकऱ्याला जमीनी एकत्रीत करून द्यायच्या आणि पुढेभविष्यकाळात जमीनीचे जास्त तुकडे होणार नाहीत अशी व्यवस्था करायचीतुकडा कशाला म्हणावे याचे जागोजागी वेगळे िकष असतीलपण महाराष्ट्रात एक एकर किंवा त्याहून लहान जमीनींना तुकडा ही संज्ञा लागू झालीतुकडे न होऊ देण्यासाठी कायद्यात खालील प्रमाणे कलमे घालण्यात आली एक एकरापेक्षा कमी जमीन असेल तर तिची विक्री करतांना आधी शेजारच्या शेतकऱ्याना विकावी तो व्यवहार ठरला नाही तरच प्रांत अधिकारी यांची परवागी काढून मगच ती जमीन इतर कुणाला विकता येईलएखाद्या एक एकर जमीनीचा मूळ मालक वारला व त्याला दोन मुले वारस असतीलतर दोघांची मालकी अर्धा अर्धा एकराची होणार मग या हिश्श्य़ांची हिस्से मोजणी करून द्यायची की नाहीयाबद्दल खूप अनिश्चितता होतीन देण्याला सयुक्तिक कारण असे की हिस्सेमोजणीच नाही करून दिली तर त्यातील एका भागाची विक्री होऊ शकत नाही.

२३एकीकडे तुकडे थांबण्यासाठी कायद्यात ही व्यवस्था होती तर दुसरीकडे जमीन जोडण्यासाठी वेगळी व्यवस्था होतीएकाच गांवात एका शेतकऱ्याच्या दोन तीन वेगवेगळ्या जमीनी वेगवेगळ्या ठिकाणी असतील तर त्याच्या शेजारी शेतकऱ्याबरोबर या जमीनी अदला बदली करून द्यायच्या म्हणजे आपोआप त्याची जमीन एकत्र येऊन त्याला जास्त चांगले उत्पन्न काढता येईलमात्र यासाठी शेजारचे शेतकरी तयार नसतील तर सक्तीने त्यांच्या जमीनींची अदला-बदली करून द्यायचीया सर्व जमीनीची आखणी करणेएकत्रीकरणामुळे तयार होणाऱ्या जमीनीचे वेगळे नकाशे करणेतलाठ्याच्या दप्तरी त्यांच्या नोंदी करणे इत्यादी कित्येक कामे अंतर्भूत होतीएका प्रकारे हा ग्यामोहळला हात घालण्याचाच प्रकार होतात्यासाठी सर्व एकत्रीकरण अधिकर्यांऱ्याना वार्षीक उद्दिष्ट नेमून दिलेली असायचीतेवढी पार पडली नाही तर पगारातून कपात व्हायचीत्यामुळे कित्येकदा सर्व्हेयर कागद पत्र तयार करून मोकळे व्हायचेप्रत्यक्ष ताबा दिला घेतला असे सांगणारे सह्याअंगठे, पंचनामे करून घेतले जायचे आणि तरीही जमीनी मूळ मालकाकडेच रहायच्यापुढे ते ते मालक वारल्यानंतर व त्यांचे वारस आल्यानंतर त्यांचे वाद सुरू होऊ लागलेएकत्रीकरण योजना अंमलात आली ती १९६० ते १९७५ या काळाततेंव्हापासून उद्भवलेले वाद अजूनही निकाली निघत नाहीतनिघू शकत नाहीत.


२४काही ठिकाणी संपूर्ण गांवात एवढे वादग्रस्त कबजे आहेत की तलाठ्यांनी दोन्ही प्रकारचे सात-बारा रेकॉर्ड तयार ठेवलेले आहेतएकत्रीकरणापूर्वी जमीन तुकड्यांना सर्वे नंबर म्हणतएकत्रीकरण झाल्यानंतर त्यांना गट नंबर असे नवीन नांव देण्यांत आले. कायद्यावर बोट ठेऊन असे म्हणावे लागेल की ज्या गावाला गटवारी लागू असेल तिथले सर्वेनबरनुसार मालकी दाखवणारे रेकॉर्ड बाद समजावे. पण प्रत्यक्षांत तसे होत नाही कारण आजही जमाबंदी कार्यालयात चुकीचे एकत्रीकरण झाले आहे ते दुरूस्त करून मिळणे अशी तक्रार करणारे सुमारे पाच हजार अर्ज पडून आहेत. त्यामुळे अजूनही तलाठ्यांकडे सर्व्हेनंबरप्रमाणे व गट नंबरप्रमाणे अशा दोन्ही प्रकारची पुस्तके असतात पण त्यातून वाद वाढतच जातात मी जमाबंदी आयुक्त असतांना सर्व तक्रारी अर्ज संगणकावर नोंदवून त्यांच्या गांववार याद्या करून घेतल्या होत्या. त्यानंतर तालुका निरीक्षक व वरिष्ठ अधिकीऱ्यांनी गांववार मेळावे घेऊन गांवातील सर्व केसची एकत्र पहाणी करून एकमेकांचा मेळ घालून निकाल द्यावेत असे आदेश दिले होतेत्याप्रमाणे कांही गांवात कामे सुरू झालीमग पुनते काम रेंगाळले त्याचे कारण खालील उदाहरणावरून समजून येईल. 




२५अशा तक्रारी केसेस अंतिम सुनावणी करिता जमाबंदी आयुक्ताकडे येतातत्या वेळी याचा प्रत्यय आला की हस्तीदंती मनोऱ्यांत बसून कायदा किंवा योजना करणाऱ्यांच्या कल्पना व प्रत्यक्ष शेतकऱ्यांसमोरील वस्तुस्थिती किती वेगळी असतेएका केसमधे एका शेतकऱ्यांची तीन मुले होतीशेतकरी अत्यंत धोरणी असावामुलांची पात्रता आणि जमीनीचा मगदूर बघून त्याने आपल्या हयातीतच वाटण्या ठरवून टाकल्या होत्यासुमारे अठरा एकर जमीनीमधे वाटण्या करताना त्याने दोन महत्वाचे निकष लावले होतेत्याच्या जमीनीत भतखाचर म्हणजे  उत्तम जमीन सपाट व मध्यम जमीन आणि डोंगर पड जमीन अशा प्रती होत्या तसेच उतारामुळे पाणी कुणाकडून कुणीकडे वाहीत्यामुळे कोणत्या जमीन तुकड्याला पाण्याचा फायदा मिळेल आणि कुणाला मिळणार नाही याचा याचा विचार करून तसेच नातवंड आहेतत्यांनाही नंतर बापाची जमीन वाटणी करून घ्यावी लागेलत्याही टणीची सोय आताच करून ठेवावी इत्यादी सर्व विचार करून त्याने जमीनीचे चौदा विभाग पाडून ते मुला नातवंडांच्या ताब्यांत देऊन ठेवले आणि सुखाने वारलामग गटवारी लागू करतांना आमच्य़ां लोकांचा सरळ हिशोब होता की तीन तीन वारस म्हणजे फक्त तीन तुकडे दिसले पाहिजेतत्याचप्रमाणे सर्व अठरा एकर जमीनीच्या एकत्रित नकाशावर पेनानेच तीन भाग पाडून एकेका मुलाला एक एक गट असे कागदपत्र तयार करूनपंचनामे करून तिघांचे अंगठे सह्या घेऊन झाल्यागटवारी लागू झाल्याच्या पुढच्याच वर्षापासून तक्रारी नोंदवल्या गेल्यासर्व भाऊ  सर्व वारसदार तक्रारीमधे सामीलगटवारीमुळे ज्याच्या वाट्याला सर्व भातखाचरं आली तो खूषज्याला डोंगरपड आली तो रडकुंडीला आलेलासन् १९७५-८० दरम्यान झालेल्या तक्रार अर्जाचा सन् १९९९ पर्यतचा प्रवास वारंवार वर खाली झाला म्हणजे तालुका ऑफीस मधील कन्सॉलिडेशन क्लर्क ते तालूका निरीक्षकजिल्हा निरीक्षकविभागीय सहआयुक्त (शिवाय प्रत्ये ठिकाणी तिथले क्लार्क व इतर मध्यम पातळीचे अधिकारी असा वारंवार होत राहीलामध्यंतरी काही वारस दगावले कांही नवीन जोडले गेलेकांही स्त्री वारस होत्या त्यांची लगने झाली इत्यादी बरेच बदल होत राहिलेआता देखील प्रत्यक्ष वहिवाट मूळ आजोबांनी करून दिल्याप्रमाणे पण जास्त तुकडे पाडून चालू आहेमात्र ज्यांना नवीन गटवारीचा फायदा हवा आहेव जे त्यांतील कांही जमीन बळकावून बसले आहेत (नवीन गटवारीच्या नियमानुसार याला बळकवणे असेही म्हणता येणार नाहीत्यांनी तक्रारी अर्ज केले आहेतही एकाच कुटुंबातील केसतरीही इतकी किचकट मग जिथे संपूर्ण गांवात अशा गटाच्या नोंदी आहेत पण प्रत्यक्ष कब्जा व वहिवाट पूर्वीच्या सर्व्हे नंबत प्रमाणे आहेतिथे पूर्ण गांवाचा आढावा घेतल्या शिवाय अशा तक्रारी र्जांचे निर्णय न्यायोचित होऊ शकत नाहीत.


२६. सन् १९९३ मधे महाराष्ट्र शासनाने अंतरिम आदेश काढून सध्या नव्याने गटवारी करू नये असे सांगितले आहेत्यामुळे नवीन गोंधळ होणार नाहीत पण कन्सॉलिडेशन कायद्यामागचा जो हेतू होता म्हणजे शेतकऱ्याची एखाद्या गांवात जागोजागी विखुरलेली जमीन एकत्र आणणे तो साध्य होत नाहीयाला एक आंशिक उपाय आहेजिथे दोन शेतकऱ्यांना सोईसाठीआपल्या जमीनीची अदलाबदली करून हवी असेल तिथे नॉमिनल रजिस्ट्रेशन फी घेऊन अदलाबदली करू द्यावीसध्या अशा अदलाबदलीला विक्री म्हटल्यामुळे व विक्रीच्या रजिस्ट्रेशनची फी खूप मोठी असल्याने सहसा शेतकरी अशा अदलाबदलीला आपणहून पुढे येत नाही.


शिवाय महाराष्ट्रात मोठ्या प्रमाणावर शहरीकरण व औद्योगीकरण वाढल्याने शेती जमिनीचा इतर
वापर फायद्याचा ठरत आहे. याही कारणाने आता तुकडेबंदी कायद्याचे प्रयोजन उरलेले नाही. मात्र

हा कायदा अजूनही रद्द न झाल्याने १९७५ पासून सुरू झालेले घोळ वाढतच गेले.

मोजणीसंमत फाळणी
२७. मागे आपण पाहिले की वाटणीमुळे पोटहिस्से पडले तरी सर्वेयरने मोजणी करून दिल्यानंतरच ती कायदेशीर होते.  या मागचे तत्व नीट समजून घेतले पाहीजेसमजा एक हेक्टर जमीनीची वाटणी दोन भावांमधे करायची आहे तर कायद्याच्या चाकोरीप्रमाणे प्रत्येकाच्या वाट्याला पन्नास गुंठे जमीन यायला पाहीजेप्रत्यक्ष मात्र जमीन सगळीकडे सारखी नसतेकुठे एखादा ओढाकुठे थोडीशी मुरूमाड जमीन इत्यादी असू शकतेतसेच जमीनीचा आकारही वेडावाकडा असू शकतोअशा वेळी दोघे भाऊ एकमेकांच्या  गांवकऱ्यांच्या सल्याने अंदाजे सारखे भरतील असे दोन वाटे करून घेऊ शकतातपण पुढे ती जमीन विकायची झाल्यास तिचे नेमकेकाटेकोर क्षेत्र माहीत असले पाहीजेते पन्नास गुंठे आहे असे नुसते म्हणून चालत नाहीम्हणून पोटहिस्सा मोजणी किंवा फाळणी करून देणारा सर्व्हेयर येईपर्यंत त्यांची वाटणीही मोजणी संमत होत नाहीसर्व्हेयरने काटेकोर मोजून दिल्यानंतर एखादेवेळी ते क्षेत्र एकोणपन्नास-एक्कावन्न असेही भरेलप्रसंगी एखादी अंदाजे आखून ठेवलेली हद्द थोडीशी बदलावी लागेल पण वाटणीमधील हे कमी-जास्त दोघा भावांना मंजूर असेल तर तेच योग्य समजले जाईलहा सर्व व्यवहार सर्व्हेयरच्या मोजणीनंतर फायनल होऊन मगच सातबऱ्यावर दोन जमीन तुकड्यांना वेगवेगळे सर्वे नंबर दिले जाऊन दोन्ही भावांच्या नांवाने वेगवेगळे रेकॉर्ड म्हणजेच सातबाराचे उतारे तयार होतीलते होत नाहीत तोपर्यत संपूर्ण एक हेक्टर क्षेत्राला दोन्ही भावांचे नांव संयुक्तपणे राहील अशी कायद्याची व्यवस्था आहेमात्र असे संयुक्तपणे नाव असतांना एका वारसाने "माझा हिस्सा विकतोअसे म्हणून चालत नाही कारण हिस्सा नेमका ठरलेला नसून सामाइ असतो.

२८. मी जमाबंदी आयुक्त असतांना एक तक्रार अशी आली -- एका व्यक्तीच पुण्यांत मोठं घर होतमरणसमयी फक्त तीन मुली व मोठा जावई एवढेच होतेइतर दोघी मुली लहान होत्या. एक तृतीयांश घर त्यांच्या ्यांच्या नावाने वाटून द्यावे अशी जबाबदारी जावयावर टाकलीजावयाची तक्रार अशी की त्याने नेटकेपणाने मुलींना वाढवालेघराचे उत्पन्न वेळोवेळी व्यवस्थित वापरत गेलासर्व हिशोब नीट लिहून ठेवलेआता त्याचा एकूण झालेला खर्च इतर दोन बहिणी देत नाहीततो खर्च अंदाजे सा-आठ हजारम्हणून त्याने वाटण्या करून घेतल्या नाहीततरीही सर्व्हेयरने घरांत त्यांचा एक-एक तृतीयांश वाटा प्रत्यक्ष मोजमाप न करता कागदावर आखून दिला आणि त्या दोघी ते ते हिस्से विकून मोकळ्या झाल्याआता झालेला खर्च त्यांच्याकडून वसूल करायचा तर दीर्घकाळ कोर्टकचेऱ्या कराव्या लागतीलपण मुळात पार्टिशन बाय मीटस बाऊंडस म्हणजेच मोजणी संमत वाटण्या झालेल्या नसतांना त्यांना आपापले हिस्से विकू देण्यात सिटी सर्वे खात्याने व रजिस्ट्रेशन मदत केलीच कशी ?

हद्दमोजणीचे वाद
२९. पुष्कळदा शेजाऱ्या शेजाऱ्यांमधे जमीनीच्या हद्दीबाबत वाद झाला कीमोजणी फी भरून तालुका भूमी अभिलेख अधिकाऱ्याने पुनएकदा खऱ्या हद्दी दाखवून देण्याची मागणी करण्यांत येतेअशावेळी सर्व्हेयर त्याच्या ऑफिसकडील मूळ जमीन नकाशाच्या प्रती घेऊन जागेवर जातात व जागेवरील प्रत्यक्ष दावेप्रतिदावे कांय आणि मूळ नकाशाप्रमाणे हद्दी कांय ते पाहून दोन्हीं जमिनी  एकत्र दाखवणारे नवे नकाशे तयार करून दोन्हीं पक्षकारांना देतातहे करीत असतांना सर्व्हेयरची भुमिका न्यायाधीशाची असू शकत नाहीती फक्त तांत्रिक सल्लागाराची असतेत्यामुळे त्याने फक्त दोन्हीं जमीनींचे एकत्र नकाशे तयार करून त्यावर मूळ नकाशारहुकूम सामाईक हद्दीची रेघ आखून देणे हीच अपेक्षा असतेअशी मूळ नकाशावरहुकूम असलेली हद्द ठळक रेषेने दाखवली जाते.

३०. अशावेळी एखादी पार्टी गैरमार्गाने आग्रह रते कीयाच नकाशावर आमची प्रत्यक्ष वहिवाटीची हद्द देखील आखून द्या जेणे करून आम्हाला कोर्टात जाता येईलसर्व्हेयरने तयार केलेला नकाशा तांत्रिक व वस्तुस्थिती दर्शक असल्याने कोर्टात तो ग्राहय धरला जात असतोमग सर्व्हेयर प्रत्यक्ष वहिवटीची हद्द एका तुटक रेषेने दावतात व त्या हद्दीवर  "प्रत्यक्ष ताबा रेषाअसा शेरा लिहून ठेवतातहे चूक आहेकारण असा शेरा असेल तर कोर्टात त्याचा असा अर्थ लावला जातो कीकुणीतरी क्वासी ज्युडिशियल किंवा न्यायदानाचे अधिकार आहेत अशा जबाबदार अधिकाऱ्याने जागेवर चौकशी करूनदोन्हीं पक्षांचे ऐकून कुणाची वहीवाट आहे ते ठरवून हा शेरा नोंदवला आहेहा अधिकार सर्व्हेयरचा नसून किमान तालुका निरीक्षक हुद्याच्या अधिकाऱ्याने रीतसर नोटिसा देऊन व चौकशी  करून  वहिवाटीची हद्द ठरवायची असतेवहिवाटीचा दावा सांगणाऱ्या प्रत्येक व्यक्तिची वहिवाट योग्य असते असेही  नाहीकित्येकदा ती अनधिकाराने असतेम्हणूनच जसे तलाठ्याने नमुना नंबर १२ मधे पीकपहाणी सदरी स्वत:हून कुळाचे नाव लावू नये तसेच सर्व्हेयरने देखील स्वत:च्या अखत्यारीत "वहिवाटी प्रमाणे हद्दकिंवा "प्रत्यक्ष ताबा रेषाअसा शेरा देता कामा नये
फार तर दोन्ही वाद घालणाऱ्या पक्षांपैकी अमुक अमुक ती वहिवाटीची हद्द असल्याचा दावा करीत आहे असे नमूद करून मगच हद्द दाखवावीअमुक अमुक व्यक्तीने दावा केलेली वहिवाटीची हद्द से लिहिल्याने कोर्टाच्या देखील लक्षांत येते कीती न्यायिक रीत्या ठरवलेली निर्दोष हद्द नाही तर फक्त एका पार्टीने दावा केलेली हद्द आहे.

३१.   अशा प्रकारे सर्व्हेयरनी "प्रत्यक्ष वहिवाटीवरूनअसा शेरा असलेली तुटक हद्द रेषा नकाशावर दाखवू नये असे आदेश जमाबंदी आयुक्तांनी सन १९९७ मधे काढले आहेत.

रेकॉर्ड-जतन -- एक मोठी जबाबदारी

३२. जमाबंदी कार्यालयाचे सर्वात महत्वाचे काम म्हणजे जमीनींचे नकाशे आखून देणेत्या त्या गांवातील ठळक स्थानविशेषाच्या नोंदी घेणेत्यांचे नकाशावर कांटेकोरपणे चित्रण करणेयासाठी अगदी पहिले नकाशे करताना सुंदरमजबूत हॅण्डमेड पेपरवर खास तयार केलेल्या व फिकी पडणार नाही अशा गडद काळ्या शाईने कार्टोग्राफर्स मार्फत नकाशे तयार करून घेतले जातप्रसंगी त्यांना मागच्या बाजूला कापड चिकटवून त्यांना अधिक मजबूती देण्यात येईअसे सुमारे शंभर सव्वाशे ते दोनशे दोनशे वर्षांपुर्वी तयार केलेले नकाशे अजूनही जिल्हा व तालुक्याच्या दफ्तरांमधे व्यवस्थित बांधून ठेवलेले आढळतातअशाच एका जुन्या नकाशामधे पावनखिंडीची जागा तसेच बाजी प्रभू देशपांडे याच्या समाधीची जागा पाहायला मिळतेजुनी देवळंदेवरायाजुनी लोकगाथेतील नांवइत्यादी नोंदी आढळतातहरियाणात पुरातत्व खात्याला एक नोंदीत "नलका टीलाअसे वाचायला मिळालेत्यावरून अंदाज घेऊन त्या ठिकाणी उत्खनन केल्यावर एक शेकडो वर्षापूर्वीचे गांव (बहूधा नळ-दमयंती आख्यायनातील नळराजाची राजधानीसापडली



३३. आता हे जुने नकाशे  हाताळल्याने व काळाच्या ओघाने जीर्ण होवून त्यांचे तुकडे पडू लागले१९९१ मधे तत्कालीन जमाबंदी आयुक्त नवीन कुमार यांनी लॅमिनेशन करून घेणे किंवा निदान त्यांना प्लॅस्टिकच्या पिशवीत टाकून बाहेरूनच त्यांची पहाणी करणे असे उपाय सर्व तालुका कार्यालयात राबविलेपण त्यांची पुनआर्खणी हाच खरा उपायत्यासाठी आता तेवढे तज्ञ व कुशल कार्टोग्राफर मिळतील की नाही ही एक शंका तर सर्व नकाशांचे संगणकीकरण करा -- हवेत कशाला कागदांवर नकाशे अशी दुसरी एक टूममाझ्या मते मात्र कागदावरील नकाशे आणि शिवाय नकाशांचे संगणकीकरण हे दोन्ही अत्यावश्यक आहेतकागदांवरील नकाशे हे कोणालाही सहजपणे तपासासाठी उपलब्ध होणारे रेकॉर्ड असते व ते खेडोपाडी दूरपर्यंत सहज उपलब्ध करून देता येतेसंगणकावरील नकाशे अजून म्हणावे तितके काटेकोरपणे तयार करणे जमलेले नाही-- त्याला वेळही   फार लागतोशिवाय तिथे टॅम्परिंग होऊ नये म्हणून घ्यावी लागणारी काळजी फार कठिण आहेतरीपण जिथे खूप काटेकोरपणाची गरज नसेलतिथे संगणकामुळे नकाशांचे काम जास्त झटपट व सुबक होऊ शकते. मुख्य म्हणजे डेटा अनॅलिसिसला त्याचा चांगला उपयोग होऊ शकतोतसेच दर दहा वर्षानी त्यांचे अपडेटिंग करणे खूप सोपे असतेमात्र हे करून घेण्यासाठीआणि ते ही कमी वेळात आणि कमी खर्चात करून घेण्यासाठी अशा व्यक्तिंची गरज आहे ज्यांना जमाबंदीची व महसूल खात्यातील कामाची पध्दत, नियमकायद्याच्या बाबी इत्यादीची पुरेपुर माहीती असेलतसेच संगणकाचे सिध्दान्तत्याची कार्यक्षमतात्याच्या मर्यादा हे ही कळत असेलतसेच येत्या तीस ते पन्नास वर्षात जमीन महसूलाबाबत शासकीय धोरण कसेकसे बदलावे लागेल याची देखील दृष्टी असेलसध्याच्या शासकीय संगणक खात्याला (उदाप्रायव्हेट व्हेण्डर्सजमाबंदीची अंतर्गत प्रकिया कळत नाही तर जमाबंदी खात्याला संगणक प्रक्रिया कळत नाहीत्यामुळे म्हणावे त्या गतीने काम पुढे सरकलेले नाहीमाझ्यामते यासाठी जमाबंदी व महसूल खात्यातील तलाठ्यापासून व सर्व्हेयर पासून तर डेप्युटी कलेक्टर पर्यंत सर्व पातळींवर संगणकाची अंतर्गत प्रक्रिया शिकवण्याची गरज आहे व ते सोपेही आहे हे विशेषप्रत्यक्षांत मात्र त्यांना फक्त ही ही बटणं दाबा आणि असे डेटा फीडींग करत चला याखेरीज इतर उपयोग त्यांना कळूच नयेत असा प्रयत्न केला जातोत्यामुळे संगणकीकरणातून जमाबंदीची प्रक्रिया सोपी कशी करता येईल या विषयाबाबत जमाबंदी व महसूली कामातील मुरब्बी स्टाफला काहीही बोलायला किंवा सुधारणांचा स्वतहोऊन विचार करायला वाव मिळकत नाहीत्यांना सांगितले जाते कीतुमचे मुरब्बी तंत्र आमच्या ताब्यांत द्या, आम्ही त्याचा ताबा स्वतःकडे ठेऊ. एकूण महसूल रेकॉर्ड आपल्या ताब्यात असावे असा विचार संगणकीकरणाचे चालक व शासकीय संगणक खात्याकडून होतांना दिसतोतलाठ्याने किंवा सर्व्हेयरने रेकॉर्डवर ताबा ठेवण्यापेक्षा वातानुकूलित खोलीतील तंत्रज्ञांनी रेकॉर्डवर ताबा ठेवणे हे कितीतरी पटीने अधिक खर्चिक व दुराग्रही ठरू शकते हे अजून आपल्याला कळलेले नाही असेच म्हणावे लागेल.

३४. जमाबंदी खात्याच्या मध्यवर्ती लायब्ररीमधे जसे जुने मौलिक नकाशे जतन करून ठेवले आहेत तशीच सर्व जुनी गॅझेटियर्समूळ सर्व्हेच्या वेळी तयार केलेले जुने रिपोर्ट्स इत्यादि जतन करून ठेवले आहेत आणि हा एक दुर्मिळ वारसाच आहेकाही वर्षापूर्वी पुण्यांत जमाबंदी खात्याने जुन्या नकाशांचे प्रदर्शन भरवले होते त्यास फार चांगला प्रतिसाद मिळाला होताअशी प्रदर्शने अधिकाधिक भरवण्यासाठी देखील संगणकाचा चांगला वापर होऊ शकतो.

शहरीकरणातील जमीन-समस्या
३५.  स्वातंत्र्यानंतर काही काळ आपण ब्रिटिशांच्या धर्तीवर शेतजमीनीच्या महसूलाला प्राधान्य देत राहीलो, कुळ वहिवाट किंवा एकत्रीकरणासारखे कायदे केले. मात्र वस्तूस्थिती बदलली. लोकसंख्या झपाट्याने वाढत होतीत्याबरोबर शहरीकरणाचा व औद्योगिकरणाचा वेगही वाढत होताजमीनीचा शेतीसाठी वापर याला प्रायमरी एकॉनॉमी नांव पडून ती निकृष्ट ठरू लागली. उद्योग हे सेकंडरी सेक्टरव्यवसाय हे टर्शियरी सेक्टरअर्बन प्लॅनिंग असे विषय महत्वाचे होऊ लागले होतेत्यातच १९७५ मधे नागरी कमाल जमीन धारणा कायदा अस्तित्वात आला आणि त्याने जास्तच गोंधळ माजवला.


३६. शहरांमधे शेतजमीन नसते तसेच गांवठाण हे देखील बिनशेती वापराचेच ठिकाणया जमीनींवर शेतसारा वसूल करायचा नसल्याने हे रेकॉर्ड तलाठ्याकडे नसून जमाबंदी खात्याच्या सिटी सर्व्हे या शाखेकडे असतेशहराभोवती जिथे शेतजमीन सुरु होते तिथे पुनः तलाठ्याचा अंमल चालू होतो. 'मुंबई कूळवहिवाट व शेतजमीनकायद्याच्या कलम ४२ अनुसार जो माणूस व्यवसायाने शेतकरी नाही किंवा ज्याच्या कडे वंशसायाने चालत आलेली जमीन नाही त्याला कलेक्टरांच्या परवानगी शिवाय शेतजमीन विकत द्येता येत नाही  व ही परवानगी कलेक्टर सहसा देत नाही.  कुणी तसा जमीन खरेदीचा व्यवहार केलाच तर महसूल अधिका-याने अशी नोंद रेकॉर्डला घेऊ नये व अशी जमीन जप्त करुन शासनाकडे वर्ग करावी अशीही कायद्यांत तरतूद केलेली आहेहा सन्‌ १९६६ मधील कायदा असून आज या कलमावर पुनर्विचार करण्याची गरज आहे त्यासाठी शासनाला वेळ मिळेस तेंव्हा मिळेलहे करतांना तुकडेबंदी कायदा तसेच महाराष्ट्र जमीन महसूल अधिनियम कलम १२२ यांचा एकत्र विचार करावा लागेलकांय सांगते हे कलम ?


३७. कोणत्याही गांवाची किंवा शहराची लोकसंख्या वाढू लागली की तिथे जास्त घरांची आणि जास्त बिनशेती जमीनीची गरज भासतेयासाठी कलेक्टरने दर दहा वर्षांनी प्रत्येक गांवाची गांवठाण-वाढ करुन द्यावीम्हणजेच गांवठाणाच्या मूळ क्षेत्रामधे चहूं बाजूंनी (किंवा योग्य असेल त्या बाजूनी शेतजमीनीपैकी लागेल तेवढे क्षेत्र शेतीतून कमी करून गांवठाणक्षेत्राच्या नोंदीत समावून घ्यावेजेणेकरुन लोकांना तिथे घरेव्यवसाय इत्यादि करता यावेजी शेतजमीन गावठाणवाढीसाठी जाहीर करण्यांत येते तिथे प्रत्यक्ष बिगरशेती वापर सुरु केला तरी त्यावर बसणारा बिनशेतसारा अगदी मामूली असतो किंवा असावा अशी अपेक्षा व व्यवस्था असते अशा नव्या जमीनींची व त्यावरील वास्तूंची नोंद सिटी सर्व्हेयर मार्फत ठेवली जातेया उलट गांवठाणवाढीत समाविष्ट नसणाऱ्या शेतजमीनीत जर एखाद्या माणसाने बिनशेती वापर सुरु केला तर त्यावर बसवला जाणारा बिनशेत सारा बराच जास्त असतोशिवाय त्यासाठी कलेक्टरची परवानगी काढली नसेल तर जबर दंड बसवला जाऊ शकतोशिवाय महसूल अधिकाऱ्याना असले बिनपरवाना बांधकाम पाडून टाकण्याचे देखील अधिकार असतात१९७६ मधे मी प्रांत अधिकारी असतांना गांवठाण वाढीसाठी घेण्याच्या गांवांचे उद्दिष्ट ठरवून दिले जायचेकोणत्या गांवाच्या गांवठाण वाढीसाठी किती व कोणती जमीन लागेल ते सर्व्हेयरने परीक्षण करुन ठरवून त्यावर प्रांत अथवा कलेक्टरांकडून मंजूरी घ्यायची असेतआता अत्यधिक प्रमाणांत बेकायदा गुंठेवारी सुरू झाल्याने ती कार्यपद्धत मागे पडलेली आहे. 

बेकायदा गुंठेवारी का वाढते


३८. गावाप्रमाणेच शहराच्या वाढीसाठी देखील सिटी सर्व्हे खात्याने प्रस्ताव तयार करुन त्यावर कलेक्टरांची मंजूरी घ्यायची असतेहे ही काम बेकायदा गुंठेवारीमुले रेंगाळलेलेकिंबहुना कालबाह्य झालेले दिसते. याचे कारण आहे. कलम १२२ सांगते की शहरवाढीसाठी रीतसर संमत केलेल्या जागेवर बिनशेतसारा  कमी म्हणजे मूळ शहरातील रेट्स इतकाच असावाया उलट शहरवाढीसाठी संमत नसलेल्या जागी बिनशेती वापर केला तर त्याला वाढीव बिनशेतसारादंडबांधकाम पाडणे इत्यादि तरतूदी वापरून अशा बिनशेतीकडे वळवल्या जाण्यावर निर्बंध बसवावेत. मात्र हा वाढीव बिनशेतसारा देखील शहरी जमिनींच्या भडकलेल्या भावांमुळे अत्यंत क्षुल्ल्कच रहातो. त्यामुळे शहरवाढीसाठी संमत व असंमत जागेतील बिनशेतसाऱ्यामधे जोपर्यत खूप मोठी तफावत आणली जात नाही, आणि असंमत जमिनींवर जमिनीच्या बाजारभावाच्या काही टक्के इतका मोठा बिनशेतसारा बसवला जात नाही तोपर्यंत शहराच्या आसपासची अस्ताव्यस्त वाढ थांबू शकत नाही. पण असे करतानाच शहरवाढीसाठी वेळच्या वेळी टाउन प्लानिंगची गरज लक्षांत घेऊन नवीन जमीन सर्व्हे व संमत करण्याची जबाबदारी महसूल खात्याने पार पाडली पाहिजे.
३९. जेंव्हा एखादी शेतजमीन गावठाण किंवा शहराच्या वाढीसाठी योग्य म्हणून घोषित केली जाते तेंव्हा त्या जमिनीवर प्लॉटस पडून घरे बांधली जातील हे ओघाने आलेचयासाठीची कायदासंमत कार्यपद्धती अशी की त्या त्या जमीनमालकाने जमीनीचा ले आऊट तयार करावा म्हणजे त्यावर किती प्लॉट पडणारत्यांचा आकार व क्षेत्र कसे कसे असेलत्यामधे अंतर्गत रस्तेप्लेग्राउंड किंवा बागेसाठी किती व कुठे मोकळी जागा असेलइत्यादींचा नकाशा करुन घ्यावा व तो सिटी सर्व्हे खात्यामार्फत मोजणीसंमत करुन घ्यावा म्हणजे सिटी सर्व्हे खात्याने सर्व प्लॉट्सच्या हद्दी तपासूनत्यांचे क्षेत्रफळ तपासून एकूण क्षेत्रफळ मूळ मोठया जमीनीच्या क्षेत्रफळातकेच आहे ना तसेच दाखवलेल्या सर्व तुकड्यांचे एकत्रित क्षेत्रफळही तेवढेच आहे ना ही खात्री करून लेआऊट वर शिक्कामोर्तब करुन द्यावेअसे केल्याने कुठलाही प्लॉट विक्रीला निघाण्यापूर्वीच त्या जमीनी मधील सर्व प्लॉट्सची नेमकी माहिती मालकालाग्राहकाला व महसूल खात्याला देखील असेल
मात्र जमीन मालकाने ले आउट मंजूर करुन न घेताच निव्वळ प्लॉट  पाडून विक्रीला सुरवात केली तर हमखास गोधळ होतात व त्यात बव्हंशी ग्राहकच नााडला जातो.


४०आता बेकायदा गुंठेवारी का वाढली त्याचे कारण समजाऊन घेण्यासाठी पुण्याचे उदाहरण पाहू याज्या जमीनीवरील प्लॉट्स मोजणीसंमत करून देण्यासाठी अर्ज येतो ती ग्रीन झोन म्हणून रिझर्व्ह केली असेलकिंवा ती शहरवाढीसाठी घोषित केली नसून तिच्यावर बिगरशेती परवानगी देखील घेतलेली नसेल, किंवा मूळ शेतकऱ्याकडून घेताना एखादा कायदेभंग करूनउदाएखाद्या बिगरशेतकऱ्याने ती जमीन विकत घेतली असेलकिंवा नागरी कमाल जमीन घारणा कायद्याखाली तिचा निकाल झालेला नसेलकिंवा त्या जमीनीवर प्लॉट्स पडणे हे तुकडेबंदी कायद्याच्या विरुद्ध असेल तर अशा जमिनीवरील ले-आऊट मोजणी संमत करुन देता येत नाहीम्हणून सिटी सर्व्हे खात्याकडून ले-आऊटची तपासणी पूर्वापार नाकारली जात असेत्यातच नागरी कमाल जमीन धारणा कायद्याच्या कलम ६ खाली ज्या जमिनीबाबत शासनाकडे माहिती देण्यात आली परंतु त्या केसची सुनावणी होऊन कमाल धारणेबाहेरील जमीन घोषित होत नाही तोपर्यंत ती शहरवाढीसाठी प्रस्तावित होऊ सकत नाही असा वेगळाच पेच निर्माण झाल्याने सरकार सिटी सर्वे खात्याकडील शहर वाढीसाठी जागा प्रस्तावित करण्याचे काम रेंगाळू लागलेशहरवाढीची गरज मात्र झपाट्याने वाढतच गेलीत्यात तुकडे बंदी कायदा शहराच्या जवळ दोन किलोमीटर हद्दीपर्यंत लागू असणार नाहीकूळवहिवाट कायदा अमुक किलोमीटर लागू होणार नाही तर अर्बन लॅण्ड सीलिंग कायद्याखाली अर्बन ऍग्लोमरेशनची हद्द शहराबाहेर तमुक किमी पर्यंत असेल अशा तीन वेगवेगळ्या हद्दी शासनाने तीन वेगवेगळ्या तारखाना ठरवल्या व त्यांचा एकमेकांशी मेळ घातला गेला नाही त्यामुळे सर्व बाजूंनी गोंधळांत भर पडली.