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Thursday, October 31, 2019

गर्भनाल ११ -- मेरी कर्मभूमि पुणे भाग २


गर्भनाल ११ -- जनवरी २०२०
मेरी कर्मभूमि पुणे भाग २

१९७५ में ही घरमें नये मेहमानके आनेकी आहट मिली। अबतक हम अपने क्वीन्स गार्डन नामक सरकारी अफसरोंके लिये बने क्वार्टरमें अच्छी तरह सुस्थिर हो गये थे। अगली मार्चमें मुझे फिर मसूरी जाना था ट्रेनिंगका अन्तिम अंश पूरा करने। तो प्रकाशने सोचा कि क्यों न घरमें एक अल्सेशियन पाला जाय़ जो सबके लिये एक अच्छा साथी बनेगा। इस प्रकार घरमें टोटोका आगमन हुआ। उसकी ट्रेनिंग और करतबोंके किस्से फिर कभी। मार्चमें मैं मसूरी गई भी। लेकिन मैं व अन्य दो महिला प्रोबेशनरोंके विषयमें डायरेक्टरको यही उचित लगा कि हम अपना बचा हुआ प्रशिक्षण अगले वर्ष पूरा करें। इसलिये मैं पुणे वापस आई। जूनमें आदित्यके जन्मके बाद अगस्तमें ड्यूटीपर भी हाजिर हुई क्योंकि उन दिनों मॅटर्निटी छुट्टियाँ बहुत कम हुआ करती थीं। एक अच्छी बात अवश्य हुई। मेरे कमिशनर श्री मोहनीने मुझे हवेली सब-डिविजनमें ही प्रांतसाहब अर्थात असिस्टण्ट कलेक्टर नियुक्त किया। इस कारण पारिवारिक जीवनमें कोई व्यवधान नही आया और मैं अपनी परिचितसी हवेली सबडिविजनमें काम देखने लगी।

हवेली प्रांतसाहबकी कार्यकक्षामें पुणे शहरके चारों ओर बसी हवेली तहसील, और पुणेके पश्चिमी भागमें बसी भोर, वेल्हा, मुलशी और मावल तहसिलें पड़ती हैं। मेरे हिस्सेकी ये चार व खेड प्रांतकी तीन तहसिलोंके वासी मावले कहलाते हैं और शिवाजीके जमानेमें इन्होंने जो पराक्रम दिखाए उनका कोई सानी नही। हवेली तहसिलका इलाका जितना वैभव संपन्न था, बाकी सातों तहसीलें उतनी ही विपन्न। पूरा इलाका सह्याद्रीके ऊँचे, दुर्गम चट्टानोंसे बना। ऐसी विपन्नता जिसे मराठीमें 'अठरा-विश्वे-दरिद्री' कहा जाता है।

मेरी पांचों तहसिल मिलाकर कुल हजार बारह सौ पटवारी, हर गाँवमें एक एक पोलिस पाटील, एक कोतवाल (यह पुराने जमानेके सामर्थ्यशाली कोतवालसे अलग चपरासी श्रेणीवाला होता है) सौ पचास मंडल अधिकारी, पांच तहसीलदार, उनके और मेरे ऑफिसके हेड क्लर्क, नाझिर क्लर्क (अर्थात अकाऊटेन्ट)- यों कहें कि कुल दो हजार लोगोंका एक कुनबा था। उनसे अच्छा काम करवाना, अच्छे कामकी शाबासी देना, जरूरत पड़नेपर बुरे कामकी सजा। यह देखना कि लोगोंसे उनका बर्ताव कैसा है, किसानके साथ कितना न्याय या अन्याय करते हैं, लगान वसूलीमें कोताही। मेरे अपने ऑफिसमें कोर्टकी हैसियतसे किए जाने वाले काम............. कुल मिलाकर कामोंकी भरमार ! चौबीस घंटेकी डयूटी। कहनेको छुट्टियाँ थीं- कैज्युअल लीव्ह, अर्नड् लीव्ह, मेडिकल लीव्ह। लेकिन मेरी सारी छुट्टियाँ हमेशा लॅप्स हो जातीं। रविवारकी छुट्टी भी मैं कभी कभार ही लेती। इसके विपरीत प्रकाशका ऑफिस घड़ी पर चलता। सुबह ठीक सात बजे घरसे निकलना और शामके ठीक सवा सात बजे घर वापस आना - चाहे कोई घड़ी मिला ले। उधर बचपनमें पिता प्रोफेसर थे, वह भी रिसर्च इन्स्टिटयूट में। सो वहाँ छुट्टियाँ बहुत होती थीं। यह मुझे कई वर्षों तक खलता रहा कि मेरे काममें इतनी कम छुट्टियाँ थीं और ऑफिस-टाइमिंगभी बिन भरोसेवाला। धीरे धीरे मैंने थोड़ी बहुत छुट्टियाँ लेना सीख लिया। लेकिन प्रांतसाहबीके कालमें कोई छुट्टी नहीं। और डयूटी भी कितने घंटे की? दिनमें केवल चौबीस घंटोंकी डयूटी। कितनी देर तक काम करना है और कब सारे पेंडिंग कामों के बावजूद 'अब बस' कह देना है, यह सीखनेमें भी मैंने देर लगाई। लेकिन दो बातें सीखीं-- कि कामको पूरा करना है और काम हर हालतमें अच्छा करना है। इसीसे काम कभी बोझ नहीं बना।

खास पुणे शहर मेरी कार्यकक्षामें नही था। वहाँके लिए अलग तहसिलदार होते थे जो सीधे कलेक्टरको रिपोर्ट करते थे- इसलिए कि पुणे शहरके सारे प्रश्न, सारी समस्याएँ अलग थीं और कलेक्टरको उन्हें तत्काल निपटाना पड़ता था। इससे एक फायदा यह हुआ कि व्ही.आय्‌.पी. मैनेजमेंटकी डयूटी मेरी नही रही और ग्रामीण इलाकेमें अपना काम करनेके लिए मुझे अधिक समय मिला।

हवेली छोड़ दूसरी चारों तहसिल ठेठ ग्रामीण थीं। और पहाड़ी भी। इन पर रास्ते भी बनाने हों तो घुमावदार, सँकरें ही रास्ते बन सकते थे। भारी वर्षाका इलाका। पूरा सहयाद्रिके ग्रेनाइटों से भरा- जिन्हें मराठीमें कातल कहा जाता है। गरीबीकी मार कायम। कहनेको यह धानका प्रदेश था- अर्थात्‌ यदि थोड़ी भी अच्छी जमीन हो तो वहाँ धान उगाया जाता था- बाकी अस्सी-नब्बे प्रतिशन जमीन पर नाचणी नामक एक मोटा अनाज होता है। आजकल इसके पापड़ काफी प्रसिद्ध हो गये हैं क्योंकि डायाबिटिसके लिए अच्छे माने जाते हैं। अन्य फसलें हैं करौंदे या घास! धानकी अत्यन्त सुगंधी और स्वादिष्ट प्रजाति आंबेमोहोर यहाँ उगाई जाती है। मेरा मानना है कि बिहारमें पकने वाली धानकी प्रजाति गमरी, और मावली तहसिलोंकी आंबेमोहोर स्वाद व सुगंधीमें बासमतीको भी मात देती है- लेकिन बासमतीकी ये खूबी उनमें नही है कि पकनेपर भी सारे दाने अलग अलग रहें।

लोनावला और खंडाला जो महाराष्ट्रके प्रसिद्ध टूरिस्ट केंद्र हैं, मावल तहसिलमें पडते हैं। पुणे-लोनावाला-मुंबई दो सदियोंसे राजमार्ग रहा है। इसी हायवेपर एक व्यापारी गॉव हैं कामशेत जहाँ लाखों टन आंबेमोहोर धानका व्यापार होता है। मुंबईके टूरिस्ट इसे खरीदे बगैर नही लौटते। फिर भी किसानके हिस्सेमें केवल गरीबी ही है।

मेरे हाजिर होनेके थोड़े ही दिनों बाद गणपति उत्सव आया। पूरे महाराष्ट्रमें और खासकर पुणेमें यह जोर शोरसे मनाया जाता है। भाद्रपद चतुर्थीके दिन गणेशजीकी स्थापना होती है और सार्वजनिक गणपति हो तो अनन्त चतुर्दशीके दिन विसर्जन। लेकिन घरेलु व्रतवाले लोग अक्सर तीसरे, पांचवें या नौंवे दिन भी विसर्जन करते हैं। मेरे हिस्सेमें तलेगांव, लोनावला और भोर शहर थे जहाँ रात देरतक विसर्जन समारोह चलता था। ब्रिटिश राजमें कभी किसी जमानेमें वहाँ दंगे हुए थे। सो नियम था कि विसर्जनके दिन प्रांतसाहबको वहीं डयूटी करनी है- ताकि दंगे न हों। इसीसे तीनोंके विसर्जन दिन भी अलग अलग थे। गाँवके प्रमुख चौराहेमें एक मंडप और शमियाना खड़ा किया जाता - प्रांतसाहेब तथा पुलिस उप अधीक्षकके लिए। उन दिनों एक प्रौढ, अनुभवी उपअधीक्षक श्री पाटील थे। हमलोग रातभर वहाँ बैठकर मूँगफली, भुट्टा, चाय पकौड़े इत्यादि खाते-पीते रहते थे। दंगोंका डर कबका विदा हो चुका था। अतएव टेन्शन नही होता था। विसर्जनके लिए चली मूर्तिके सामने ढोल व लेझीम सहित नाचने खेलनेकी प्रथा है। खेलने वाले हमारे पास आकर देरतक रूक कर पूरे जोशके साथ हमें खेल दिखाते थे। यह बारिशका महीना होता है और अक्सर हल्की बूंदाबांदी हो जाती है। ऐसे समय ढोल या हलगीका चमड़ा ढीला पड़ जाता और उससे खण्ण की आवाजकी जगह भद्द की आवाज आती थी। हमारे मंडपमें भुट्टे आदि भूननेके लिए आग या गैस जलाई जाती थी। उसीपर वे अपने ढोल तथा हलगीके चमडेको तपाते थे। फिर खेल शुरू हो जाता। इस आधे पौने घंटेमें उनसे अच्छी बातें हो जातीं और गाँवकी जानकारी भी - खास कर फसलोंकी जो तबतक भर चुकी होती हैं। उससे अंदाज हो जाता कि उस साल फसल और अनाजकी उपलब्धता कैसी रहेगी।

इस वार्षिक उत्सवके लिए कई गॉवोंके लेझिम-पथक पूरे साल भर तैयारी करते हैं। उनमें काम्पिटीशन होती है कि किसका खेल सबसे अच्छा रहा। मुलशी तहसिलका भूगांव लेझीम पथक मुझे आज भी याद है- जो उन दिनों पूरे जिलेमें एक नंबरपर माना जाता था। गणपति उत्सवके ढोलके ताल और सुर मेरे दिमागमें अंदर तक पैठ गए हैं। मुझे कभी इनसे कोई परेशानी नहीं होती। लाऊडस्पीकरोंके लाऊड संगीतसे मुझे सख्त ऑबजेक्शन है। कभी कभी तो 'भूले बिसरे गीत' में बजनेवाले मेलोडियस गाने भी शोर जैसे लगते हैं- लेकिन ढोल-हलगी कभी शोर नहीं लगती।

बिहारमें शिक्षा होनेके कारण मराठी साहित्य और साहित्यकारोंसे मेरा परिचय नहींके बराबर था। एक दिन एक बड़ा सुंदर उपन्यास पढा- 'हम भगीरथके पुत्र'। भाखडा नांगल डॅम बननेकी पार्श्वभूमि पर लिखा यह उपन्यास धरण बनाने वाले इंजिनियरोंकी कुशलताको समर्पित है। मुझे यह इतना पसंद है कि तबसे आज तक इसे हिंदीमें अनूदित करनेकी इच्छा मनमें है। किसीने बताया कि इसके लेखक श्री दांडेकर तलेगांवमें रहते हैं। लेकिन उनसे मिलनेमें संकोच होता रहा। आज पता चलता है कि मैंने क्या खोया, क्योंकि दांडेकर न केवल एक अच्छे साहित्यकार बल्कि सहयाद्रिके पठारों पर बसे सभी किलोंके एनसाइक्लोपीडिया थे। ऐसी ही एक और मुलाकातसे मैं वंचित रही- वे थे शिक्षा-गुरू जे.पी.नाईक जो मेरे इस कार्यकालमें काफी बीमार थे लेकिन थे पुणेमें ही।

मेरी प्रांतसाहबीके चार वर्ष पूर्व अर्थात्‌ १९७२ और १९७३ में महाराष्ट्रमें अभूतपूर्व अकाल पड़ा। इससे छुटकारेके लिए दो योजनाएँ सामने आईं। एक थी रोजगार हमी योजना, इसमें सरकारने रास्ते बनाने, सिंचन तालाब और मृदा-संधारणके काम शुरू किए जिसपर काम करके लोगोंको मजदूरी मिल सके। अहमदनगर और सोलापुर जैसे जिलोंमें पचास हजार से एक लाख तक लोग ऐसे कामोंमें लगाए गए। आगे चलकर यही रोहयो पूरे देशमें मनरेगाके नामसे भी लागू हुई।

रोहयोके काम मावली तहसिलोंमें संभव नहीं थे। लेकिन अच्छी बात थी कि घास और पशुधनकी बहुलताके कारण उन्हें इसकी अधिक आवश्यकता नही थी। दूसरी योजना थी अनाजके लेव्हीकी योजना जिसके अर्न्तगत किसानके खेतमें पके अनाजमेंसे एक बड़ा हिस्सा सरकार खरीदती थी। इसके दर निश्चित थे और अधिकतर किसानोंको अमान्य होते थे। मुख्य लेव्ही ज्वार या बाजरेकी होती थी। कभी कभी चावल और गेहूँ भी लिये जाते। कलेक्टरकी मीटींगमें पहला अजेंडा यही होता था कि किस तहसीलका लेव्ही कलेक्शन कितना रहा।

प्रांतसाहबको हर महीने कमसे कम २० गांवोंमें व्हिजिट, इन्स्पेक्शन आदि तथा दस गाँवोंमें नाइट-हॉल्ट रखना पड़ता था। तब फोन इत्यादि सुविधाएँ अल्यल्प थीं। हमारा एक महीनेका कार्यक्रम पहले ही सूचित किया जाता था। फिर पटवारी उस उस गाँवमें लेव्ही अनाजके बोरे तैयार रखते थे। प्रांत साहेबके आने पर उन्हें सजीधजी बैलगाड़ीमें बिठाकर गांवके चौपालमें बाजे गाजेके साथ ले जाया जाता। वहाँपर पहले ही बोरियोंमें लेव्हीका अनाज, तराजू इत्यादि तैयार रहता था। तहसिलसे सिव्हिल सप्लाई क्लार्क और गोडाऊन कीपर पहुँचे रहते थे। फिर प्रांतसाहबके हाथों तराजूका विधिवत्‌ पूजन, नारियल फोडना, फिर अनाजकी गड्डी तराजूमें रखवाना, इत्यादि सम्पन्न होता, उधर सप्लाई क्लार्क खटाखट रसीद फाड़ता चलता था।

लेकिन कभी कभी कलेक्टरका तय किया हुआ टार्गेट पूरा नही होता था। फिर क्या था? पटवारी मीटींगमें पटवारीको फायरिंग! अर्थात फायरिंगके लिए पटवारी और शानसे सवारी निकालनेके लिए प्रांतसाहब- यही कामका बंटवारा होता था। हम- यानी मैं और दूसरे प्रांतसाहब चर्चा करते- कि हम इतनी कड़ाई दिखाते हैं और पटवारियोंसे काम करवाते हैं, जब कि खुद हम वरिष्ठोंकी कड़ाईके कारण नही बल्कि स्वयंकी कर्तव्यनिष्ठाके कारण काम करते हैं। यह मुगालता लम्बे काल तक रहा। ऐसेमें पटवारीके हाथमें एक ही उपाय बचता था कि किसानको खसरा खतौनी आदिके कागज तबतक न दे जबतक उसके टार्गेट पूरा न हो जाए, चाहे वह लेव्हीके टार्गेट हों या लगान वसूलीके। स्मॉल सेव्हिंग योजनाके लिए किसानसे पोस्ट ऑफिसमें पैसे जमा करवाने हों या शिक्षक दिनके लिए फंड इकट्ठे करने हों। फिर किसान हमारे पास शिकायत करते कि पटवारी खसरा खतौनीके कागज नहीं दे रहा। तो हम फिर पटवारीको धमकाते थे। जिस पटवारीको एक बार किसानके कागज रोक कर सरकारी टार्गेटके लिए पैसे जमा करनेकी आदत पड़ गई वह अपने लिए भी कुछ जमा पूँजी कर ही लेता था। लेकिन यह भी सौ प्रतिशत सही नही है। तहसिलदार, प्रांतसाहेब, कलेक्टर, मंत्री आदि जब भी किसी गांवका दौरा करते हैं, उनके खाने पीने और तामझामकी व्यवस्था पटवारी करते हैं। फिर उसके पास यही उपाय होता है कि गाँवके धनी किसानोंसे कह कर व्यवस्था करें। यहींसे भ्रष्टाचारकी शुरूआत होती थी। इसीसे मैंने अपने लिए नियम बना लिया था कि दौरे पर जाना हो तो अपने खानेका बिल, या साथमें जितने भी कनिष्ठ अधिकारी हों, सबका बिल मैं ही देती। कोई वरिष्ठ अधिकारी मेरे इलाकेमें आते तो यथासंभव सादगी बरती जाती। मजा यह कि जब भी कभी मेरे कलेक्टर या कमिश्नर दौरे पर आए, वे भी अपने सहित तमाम कनिष्ठोंका बिल खुद देते थे- मुझे नही देने देते। लेकिन मंत्रियोंकी बात अलग थी। उनका खर्चा औरोंको उठाना पड़ता।

यहाँ तय कर पाना मुश्किल है कि पटवारीकी ईमानदारी किस जगह समाप्त होती है और कहाँसे उसका भ्रष्टाचार शुरू होता है। फिर भी जब भी कोई किसान शिकायत करे, तो उसकी शिकायत दूर करना हर हालतमें पहला फर्ज बनता था।

लेव्हीके विषयमें बारामतीके प्रांत अधिकारी जैनने अपना प्रिय किस्सा सुनाया। वे तब नए नए एम्‌.पी.एस्‌.सी की परीक्षा उत्तीर्ण होकर प्रोबेशनर प्रांत अधिकारी लगे थे। तहसिलदारके साथ लेव्ही वसूलने गए। एक गाँवमें किसी किसानके घर भोजनकी व्यवस्था थी। दस बारह कर्मचारी और गाँवके आठ दस अन्य प्रतिष्ठित। पंगत चल रही थी कि किसी गरजवश गृहपतिने भंडार-घर खोला। तहसिलदारने देख लिया कि वहाँ कई बोरियाँ भर अनाज रखा हुआ था जबकि किसानने पूरी लेव्ही यह कहकर नही भरी थी कि अधिक अनाज पैदा ही नही हुआ। फिर क्या था? पंगत आधे खानेपर ही रूक गई। तहसिलदार उठे। बोरियाँ गिनी। लेव्हीके हिसाबसे बोरियों पर ठप्पा लगाया- सरकारी गोदामका। सप्लाई क्लर्कसे रसीदें बनवाईं- तब कहीं जाकर पंगत आगे बढी। तहसिलदारने सबको सुनाते हुए जैनसे कहा- प्रांतसाहव, इस किसानसे अनाज वसूली करके हम अपना सरकारी टार्गेट पूरा कर रहे हैं- कर्तव्यनिष्ठा दिखा रहे हैं- यह भावना पलभरको भी मनमें न लाइए कि इसीके घर अन्न ग्रहणकर इसीका अनाज कैसे सरकार-जमा कराऊँ। अन्न-ग्रहण अपनी जगह है, कर्तव्यपूर्ति अपनी जगह! यह तत्व-दर्शन सुनकर जैन अवाक्‌ रह गये।

मैं प्रांतसाहब बनी, तभी पुणे जिलेमें भारतीय विदेश सेवाका एक अधिकारी फ्रान्सिस प्रोबेशनर आया। साथ ही टेलिफोन सेवामें एक प्रोबेशनर आया महेंद्र। फ्रान्सिस ट्रेनिंगके लिये मेरे साथ ही अटैच्ड् था। महेंद्रके सिनियर्स पर मैंने अपने प्रांतसाहब होनेका रोब जमाकर अनुमति ले ली थी कि हमारे दौरेमें वह भी साथ आया करेगा। भारतीय विदेश सेवाके सभी अफसरोंको एक वर्षके लिये ग्रामीण इलाकोंमें ट्रेनिंग दी जाती है ताकि विदेश जानेसे पहले उन्हें पता रहे कि अपने देशमें छोटेसे छोटे लेवलपर प्रशासनका काम कैसे चलता है। महेंद्रको भी आगे चलकर ग्रामीण इलाकोंमें टेलिफोन नेटवर्क पहुँचाने जैसे काम करने ही थे।

सो हम तीनों दौरे पर जाते- जीपमें अगली सीटों पर बैठकर। पीछे हमारे पटवारी, ड्राइवर, क्लर्क इत्यादि होते। रास्तेमें हम लोग शोर मचाते, गीत गाते, अंताक्षरी खेलते और झगड़ते भी थे। लेकिन इन्स्पेक्शनकी जगह पहुँचकर एकदम गंभीरता धारण कर लेते थे। इसी समय डिफेन्स अकाउंट सर्विसमें राधा नामक अफसर भी आ गई थी। मैं और राधा पंजाबी ड्रेस पहने, किराएकी साइकिल लेकर पुणेमें चक्कर काटते। चूँकि मेरा कार्यक्षेत्र पुणेसे बाहर था सो यह डर नहीं होता था कि लोग देखेंगे और मेरा रोब खतम हो जायगा। इससे मैंने एक बात और सीखी- अपने पोस्टिंगके स्थान पर यदि 'प्रसिद्ध' होनेके मोहसे अपनेको बचाकर रखा जाए तो अपनी मर्जीकी कई बातें की जा सकती हैं और यह डर नही रहता कि कोई देखेगा तो क्या कहेगा। अपनी प्राइवसी बची रहती है। वरना भाप्रसेकी नौकरीमें प्रसिद्ध होनेके मौके और मोह दोनों ही बहुतायतसे होते हैं।

यों दिनचर्या चल रही थी कि तभी लोकसभा चुनाव घोषित हो गए। इसके लिए मतदाता सूची बनानेका जिम्मा कलेक्टर और प्रांतसाहबका होता है। उपरसे निर्देश मिला कि अमुक प्रतिशत जाँच पडताल प्रांतसाहब स्वयं करें। मुझे आज भी याद आता है कि कैसे एक दिन लोनावलामें भरी बारिश में, मैं, फ्रान्सिस और महेंद्रने लोगोंके घर-दुकानमें जा जाकर मतदाता सूचीकी पडताल की थी।
लोनावला एक अच्छा टूरिस्ट स्पॉट है जहाँ मुम्बईसे भारी संख्यामें लोग आते हैं। यहाँ दसियों दुकानदार 'चिक्की' अर्थात्‌ मूँगफली और गुडकी रेवडी बनाते हैं। लेकिन सर्वोत्तम माना जाता था कूपर चिक्कीको। इस कूपर चिक्कीवालेका लडका फ्रान्सिसका दोस्त निकला। हमारी जान पहचान हुई। लेकिन इसके बाद जल्दी ही अचानक वह लड़का कार ऍक्सीडेंटमें मारा गया। इकलौता लड़का। कूपर चिक्कीकी दुकान उस दिनसे जो गिरने लगी सो महीनोंतक नही संभल पाई। मेरी आँखोंके सामने चार पाँच वर्षोंमें ही एक अच्छे कारोबारका ह्रास होते हुए देखा। बादमें कूपरकी बेटी खुर्शीदने उसे फिर संभाल लिया।

इसका उलटा भी देखा है- व्यंकटेश हॅचरीके रूपमें। मैं प्रोबेशनर थी जब एक गाँवमें थोड़ीसी जमीन पर चार पांच सौ मुर्गियोंसे यह हॅचरी शुरू हुई। अगले दो वर्षोंतक वे जमीन खरीदते रहे- कारोबार बढाते रहे- इस या उस अनुमतिके लिये मेरे ऑफिस आते रहे और देखते देखते अपना कारोबार इतना बढा लिया कि दस वर्षोंमें ही यह एशियाकी एक बड़ी हॅचरी बन गई। मेरा योगदान यह रहा कि उनके नये कारोबारका उदाहरण देते हुए मैंने सरकारमें प्रभावी ढंगसे यह बात रखी कि केवल मुर्गियाँ पालना भी कृषि-आधारित मानकर उसे कृषिहेतु दिये जानेवाले कई कन्सेशन्स देने चाहिये, खासकर इंडस्ट्रियल टॅक्स नही लगना चाहिये। मेरी शिफारिस मान्य भी हो गई, जिसका फायदा हॅचरीको हुआ। मैं दौरेके लिये अक्सर उधरसे गुजरती और अपनी आँखोंके सामने देखती कि कैसे एक अच्छा कारोबार फल फूल रहा है। अपनी मुर्गियाँ बेचनेके लिए दूसरे लोगोंको हॅचरीमें प्रेरित करना, सरकारसे सुयोग्य नियम कानून बनवाना, अंडोंका मार्केट ऑर्गनाइज करना, जैसे कई काम इसके प्रणेता रावने किए। हालाँकि वे अब नही रहे लेकिन अब भी यदि मैं उधरसे गुजरूँ तो लगता है यह अपनी ही हॅचरी है, इसकी उन्नति और प्रगतिमें अपना भी कुछ योगदान है, शुभकामनाएँ हैं।

इसी कार्यकालमें एक बार तत्कालिन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधीका पुणे दौरा तय हुआ। वे खडकवासला स्थित नॅशनल डिफेन्स अकादमी (NDA) और सेंट्रल वॉटर ऍण्ड पॉवर रिसर्च इन्स्टिटयूट (CWPRS) में भी जानेवाली थीं। प्रधानमंत्रीकी सुरक्षा व्यवस्थाका तामझाम बहुत बडा होता है, दिल्लीसे कई गुप्तचर अधिकारी पहलेसे आ धमकते हैं। फिर भी लोकल कलेक्टर और प्रांतसाहबकी जिम्मेदारी बनी रहती है। इसलिये मैं भी पहले एक इन्स्पेक्शन दौरा करने गई। NDA में ऍडमिरल आवटी थे और CWPRS में डॉ. सक्सेना। एक महिला अधिकारी इन्स्पेक्शनके लिये आई इसका लाभ उठाते हुए दोनोंने तत्काल मुझे सबसे पहले वह कमरे दिखाये जहाँ इंदिराजीके ठहरने या आरामकी व्यवस्था थी- 'एक महिलाकी नजरसे देखकर बताइये- यदि इसमें कोई कमी रह गई हो तो'। इंदिराजी जिस गाडीमें बैठकर उस क्षेत्रमें घूमनेवाली थीं उसमें बैठकर भी मैंने जायजा लिया- सीट कितनी आरामदेह है, लेग स्पेस समुचित है या नही, नजरकी लेव्हल कहाँ तक जाती है और वहाँ क्या क्या दीखता है इत्यादि। लेकिन एक समस्या थी कि इंदिराजीकी तुलनासे मैं बहुत ही नाटे कदकी हूँ। सो हम लोगोंने एक लम्बे व्यक्तिको बिठाकर फिरसे सारा इन्स्पेक्शन पूरा किया।

इस बहाने इन दोनों उच्चाधिकारियोंसे मेरी अच्छी पहचान हो गई। बादमें एक बार मुझे ऑस्ट्रेलियामें भूगर्भ विज्ञानकी पढाईके लिये आवेदन देना था जिसमें रेफरन्सेस देने थे। मैंने डॉ. सक्सेनासे रेफरन्स माँगा और अपना आवेदन पत्र भी उन्हें दिखा दिया। इसमें मैंने लिखा था कि चूँकि मैं पानी संकटसे जूझने वाले एक प्रांतमें हूँ, अतः यह पढाई मेरे काम आयेगी। डॉ सक्सेनाने उसे काट दिया। लिखवाया कि भारतीय प्रशासन सेवाके अधिकारी सरकारमें वरिष्ठ भूमिकाएँ निभाते हैं। योजना, उनका कार्यान्वयन, नीतिनिर्धारण इत्यादिके लिये पानीके स्रोतोंकी जानकारीके तकनीकी तौरतरीके मालूम होना आवश्यक है, अतएव इस पढाईका लाभ मेरे कैरियरके अगले पच्चीस वर्षोंमें मुझे तथा मेरी सरकारको होगा। अपने कामके विषयमें इस तरह दूरगामी विचार करनेकी सीख मुझे उनसे मिली। तबसे मेरी आदत बन गई कि कोई नई योजना बनाते समय उसके शीघ्र परिणाम और दूरगामी परिणाम दोनोंको सोचो, उसी हिसाबसे योजना बनाओ, उसके नियम बनाओ। कई बार मैंने दूसरोंके लिखे बायोडाटा भी इसी प्रकार सुधार दिए और उनसे धन्यवाद लिया, तब मुझे डॉ सक्सेनाकी याद आती है। दुर्भाग्यसे वे जल्दी ही कालवश हो गए।

उन दिनों इमर्जन्सी चल रही थी और फॅमिली प्लानिंग कैम्पस्‌ पर काफी जोर था। हर कलेक्टर, प्रांतसाहब और तहसिलदारके लिये टार्गेट तय किया जाता था जो अन्ततः फिर पटवारी पर आता था। यह कोई ऐसा काम नही था जो पटवारी खसरा खतौनेकी कापियाँ देनेसे मना करके या वसूलीका डर दिखाकर लोगोंसे करा ले। यहाँ लोक-प्रबोधनकी बडी आवश्यकता थी। सो मैंने भी कई लेक्चर दिये हैं, ग्राम सभाओंमें और कहाँ कहाँ। इसमें मैं देशकी जनसंख्यासे उत्पन्न समस्याएँ, गरीबी, कृषि जमीनकी घटती पैदावार, अशिक्षा आदि बातोंपर बल देती। साथ ही जहाँ कैम्प लगाया है वहाँकी सुविधाओंकी जाँच, मेडिकल टीमसे विचार विमर्श इत्यादि। खासकर महिलाओंकी अपेक्षा पुरूषोंकी नसबंदीकी उपयोगिता लोगोंके साथ-साथ प्रशासनके कर्मचारियों और अधिकारियोंको समझाना। उन दिनों लेप्रोस्कोपी तकनीक नही थी। महिला शस्त्रक्रिया एक गंभीर शस्त्रक्रिया होती और महिलाको पच्चीस तीस दिन अस्पतालमें रखना पड़ता। सरकार उसे इन्सेन्टिव्हके तौरपर एक सौ पचीस रूपये देती। इसलिए मैंने पिंपरी चिंचवड नगर पालिकासे एक स्कीम बनानेको कहा जिसमें पुरूष नसबंदी होने पर उसे एक हजार रूपयेका इन्सेन्टिव्ह दिया जाने लगा। सो हवेली प्रांतके जितने भी पुरूष नसबंदीके लिये राजी होते उन्हें हम पिंपरी ले आते। इस कारण इन दो वर्षों में पिंपरीमें कई हजार पुरूष नसबंदीके ऑपरेशन हुए।

वह इमर्जन्सीका दौर था। पूरे देशमें फॅमिली प्लानिंग ऑपरेशन्सपर जोर था। मेरे जो बॅचमेट अन्य राज्योंमें थे, उनसे मैं सुनती कि वहाँ क्या क्या धाँधलियाँ या जोर जबर्दस्ती हुई। ऐसा भी नही कि महाराष्ट्रमें सब तरफ ऑल-वेल हो। ऐसेमें एक सजग अधिकारी केवल इतना कर सकता है कि अपने इलाकेमें जहाँ तक संभव है, धाँधलियाँ, गबन या जुलुम न होने दे। थोड़ा प्रेशर बनाना जरूरी होता था जिसके लिये मैं जिला परिषदके लोक-नियुक्त सदस्योंको भी प्रचार सभाओंके आग्रहपूर्वक ले जाती और वे भी काफी मददगार साबित हो रहे थे।

यह एक अलग डिबेटका विषय है कि क्या बडी जनसंख्या विपन्नता लाती है? क्या जनसंख्या नियंत्रण आवश्यक है? और यदि है तो क्या नसबंदी ऑपरेशन ही उसका एक मात्र तरीका है? या यह कि जनसंख्या नियंत्रणका उद्देश्य पूरा करनेमें नसबन्दीका योगदान कितने प्रतिशत है? लेकिन यह भी दुर्भाग्यपूण है कि १९८० के बाद दुबारा किसी सरकार या किसी पार्टीकी हिम्मत नही हुई है इस विषय पर लोक बहस करवानेकी।

मेरे प्रशिक्षण कार्यकालमें भी मैं अच्छी खासी टूरिंग कर लेती थी। और प्रांतसाहबकी पोस्टिंगके बाद तो यह काफी बढ गई। महीनेमें अठारह दिन टूर, जिसमें दस नाईट हॉल्ट कम्पल्सरी थे। अब घरमें हम दो के अलावा टोटो और आदित्य भी थे। दोनों साथ साथ ही बडे हुए। टोटोको प्रकाशने बडी अच्छी ट्रेनिंग दी थी जिससे वह पूरे इलाकेमें प्रसिद्ध था। आदित्यने बोलना सीखा तो वह भी टोटोको आदेश देने लगा। दोनोंका नाम पडा लिटिल मास्टर विथ बिग फ्रेंड।

आदित्यके जन्मसे पहले मैं अकेली ही टूर पर जाती और कभी कभी प्रकाश भी साथ होते। पुणेके आसपास कई शिवाजी कालीन किले हैं, वह दुर्गभ्रमण हम दोनोंको पसंद था। आदित्यके जन्मके बाद मेरे नाइट हॉल्टका प्रोग्राम सदलबल होने लगा- मेरे साथ आदित्य, उसकी बूढी आया, टोटो, ऑफिसका चपरासी, टोटोके खाने-बिछानेका सामान इत्यादि। वे सारे डाक बंगलेमें रुकते थे और मैं इन्स्पेक्शनका अपना काम करती। कभी कभी प्रकाश भी साथ हो तो वे सारे किले और पहाड़ोंपर निकल जाते। इस प्रकार टोटो और आदित्यने वे सारे पहाड़ और किले घूम लिये। आज इतने वर्षों बाद भी डाक बंगलोंके पुराने नौकर, खानसामें और पुराने पटवारी टोटोको याद कर लेते हैं और आदित्यका हालचाल पूछ लेते हैं।

मई १९७७ में लोकसभा चुनावोंकी घोषणा हुई और मैंने जान लिया कि अब तो मेरा काम और भी बढेगा। सो मैंने दो महीने आदित्यको माँके पास रखनेका फैसला किया। इससे पहले भी दो महीने ट्रेनिंगके लिये मसूरी जाना पड़ा तब आदित्य मुंबईमें मेरी सासूजीके पास रहा। मैं यदि कहूँ कि आरम्भिक कार्यकालमें मेरी कार्यक्षमता बढानेमें आदित्यकी दादी व नानीका बडा हाथ था, तो यह अतिशयोक्ति नही होगी। मेरे ही नही बल्कि मेरी बहन और भाईके बच्चे भी कई कई महीने मेरी माँके पास रहे हैं और आज भी अच्छे संस्कारोंके लिये अपने माँ-बापसे अधिक मेरे माँ-पिताजीको श्रेय देते हैं। मुझे लगता है कि एकत्रित कुटुम्ब पद्धतिकी यह बडी विशेषता थी। आज भी यदि सास-बहू, या ननद-भाभियाँ आपसी रिश्तेमें एक दूसरेका सम्मान बरकरार रखें तो इस विशेषताका लाभ उठा सकती हैं। मेरी तीनों ननदें मुझसे बडी और खुद नौकरी करनेवाली थीं। अतएव मेरी सासूजी भी मेरी नौकरीकी आवश्यकताओंको समझती थीं और उनका खयाल रखती थीं। हम दोनोंके बीच एक कड़ी और थी। यद्यपि वे विशेष पढी लिखी नही थीं लेकिन रोजाना तीन अखबार पढती थीं और पोलिटिक्सकी अच्छी समझ रखती थीं। उन्हें इस विषयपर चर्चाके लिये मुझसे अच्छा किस्सागों घरमें और कौन हो सकता था? सो वे मेरे काममें काफी रूचि लेती थीं।

लोकसभा चुनाव एक तरहसे शादीके तामझामकी तरह होते हैं। कितना भी काम करो, कम ही है। पूरी जिम्मेदारी कलेक्टरकी। इलेक्शनके कामके लिये वह जिलेमें स्थित किसी भी सरकारी कार्यालयसे चाहे जितने अधिकारी, कर्मचारी, गाडियाँ और अन्य सामग्री रिक्विझिशन कर सकता है। फिर इन सबको प्रशिक्षण भी देना पड़ता है- जो जिम्मेदारी प्रांत अधिकारीकी थी। मुझे अलग अलग लोगोंके लिये कुल तीन बार ट्रेनिंग क्लास लेनी पडी। हालाँकि मेरे लिये भी यह काम नया ही था लेकिन किसी जमानेमें कॉलेजमें लेक्चररी की थी जो काम आ गई। उस ट्रेनिंगको भी लोग आजतक याद करते हैं।

लोकसभा चुनावोंमें इंदिराजी हारीं- और देशमें पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। इस चुनावमें एक घटना घटी जिसने आगे चलकर मुझे भी प्रभावित किया। हुआ यों कि पुणे जिलेकी तीन लोकसभा सीटोंमें से खेड लोकसभा सीटके लिये ऍडिशनल कलेक्टर अरूणा बागची रिटर्निंग ऑफिसर थीं। यह तय था कि इस सीटके लिए अण्णासाहब मगरको कांग्रेसी टिकट मिलेगा और वे जीतेंगे भी। लेकिन एक समस्या थी। पिंपरी चिंचवड म्युनिसिपल कार्पोरेशन हालमें ही बना था, उसका पहला चुनाव होना बाकी था, अतएव एक्ट के मुताबिक राज्यपालने अपने अधिकारमें अध्यक्षके पद पर अण्णासाहबकी नियुक्ति की हुई थी। यदि वे लोकनिर्वाचित अध्यक्ष होते तो कोई बात नही थी। लेकिन फिलहाल वे सरकार द्वारा नियुक्त अध्यक्ष थे। अतएव मुद्दा यह उठा कि क्या वे वहाँसे पदत्याग किये बगैर चुनावमें उम्मीदवार बन सकते हैं?

अरुणाजीने अपने कार्यालयमें अच्छे अच्छे वकीलोंको बुलाकर उनसे राय सलाह आरंभ कर दी। उन मीटींगोंमें मैं भी शामिल थी। उधर अण्णासाहबके वकील भी अपनी राय बनाने लगे। अभी नामांकन पत्र भरनेमें देर थी लेकिन यह कानूनी पेचिदगी अखबारोंमें भी छपी। सारी चर्चा एक मुद्दे पर टिक गई कि 'एन्जाईंग ऑफिस ऑफ प्रॉफिट अंडर अपॉईंटमेंट ऑफ गवर्नमेंट' का क्या अर्थ निकाला जायगा। इधर अण्णासाहबकी ओरसे दुहराया जाने लगा कि पदत्याग आवश्यक नही और वे नही करेंगे। उधर अरुणाजीके ऑफिससे कहा जाने लगा कि यदि पदत्याग न किया हो तो नामांकनकी जाँचके दिन वे उनका नामांकन नामंजूर कर देंगी। यह भी महत्वपूर्ण है कि ऐसे मामलोंमें रिटर्निंग अफसरका फैसला अन्तिम माना जाता है। हमलोग उत्सुकतासे इंतजार कर रहे थे कि नामांकन जाँचवाले दिन दोनों पक्षोंके वकीलोंमें क्या बहस होती है और अरुणाजी क्या फैसला देती हैं।

लेकिन नामांकन भरनेसे एक दिन पहले अण्णासाहबने अपने पदसे त्यागपत्र दे दिया। सारा सस्पेन्स, सारी रोचकता, गरमा गरम बहस, सब कुछ गुब्बारेकी तरह पिचक कर शून्य हो गया। यही रोचकता तो सरकारी दफ्तरोंकी जान होती है, उसे अण्णासाहबने नाकारा कर दिया। खैर!

पिंपरी चिंचवड कार्पोरेशनके लिये राज्यपालने मामासाहब मोहलको अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। एक किस्सा खतम हो गया। अण्णासाहब चुनाव लडे, जीते और लोकसभामें आ गए। लेकिन काँग्रेस पार्टी बुरी तरह हारी थी। अगले ही वर्ष महाराष्ट्र विधानसभाके चुनाव घोषित हुए जिसमें हवेली विधानसभा सीटके लिये मैं रिटर्निंग अफसर थी और मामासाहेब कांग्रेसी टिकटपर चुनाव लड़ना चाहते थे। इस बार देशभरमें कांग्रेस विरोधी माहौल था। मामासाहेबको कोई गॅरंटी नही थे कि वे जीतेंगे, अतः वे अपने म्युनिसिपल अध्यक्षके पदको छोड़ना नही चाहते थे।

यहाँ वही खेल मैं खेल सकती थी जो अरुणाजीने किया था। मैं राय सलाहके लिए वकील बुला सकती थी। लेकिन मैंने सोचा- सारी बहस तो मैं सुन चुकी हूँ और पुणेकी जनता भी सुन चुकी है।। बागची बनाम अण्णासाहब के बहाने सारे कानून मैंने भी पढ डाले हैं और चुनावी दिग्गजोंने भी। यह तो बड़ा स्पष्ट मामला है- 'एन्जाईंग ऑफिस ऑफ प्रॉफिट अंडर अपॉईंटमेंट ऑफ गवर्नमेंट' की स्थिति यहाँ बिलकुल लागू होनेवाली है।

नामांकन भरनेके दिन मामासाहबने पुणे जिलेके दिग्गज कांग्रेसी नेताओंसे राय ली और बिना पदत्याग किये नामांकन भर दिया। ३-४ दिनोंबाद नामांकनपत्र जाँचनेका दिन आया तो मामासाहबके अलावा उनके वकील और जनता दलके उम्मीदवारके वकील भी आए। मामासाहबके वकील ने कहा- आप इन्जाईंग शब्दपर ध्यान दीजिए। मामासाहेब नियुक्त अध्यक्ष होनेके बावजूद कार्पोरेशनसे केवल एक रूपयेका टोकन मासिक वेतन लेते हैं तथा ऑफिस आने जानेके लिए अपनी ही कारका प्रयोग करते हैं। इसे 'एन्जाईंग' नही कहा जा सकता। बात थी बालकी खाल निकालने वाली, लेकिन वकीली दाँवपेंच तो यही होते हैं।

ऐसे मौके पर चुनाव अधिकारी जो भी जाँच पडताल करता है वह समरी इन्कवायरी कहलाती है। नियममें लिखा हुआ है- 'चुनावी अधिकारी अपनी विवेक बुद्धिसे निर्णय करे।' यहाँ कानूनी बहस या बालकी खाल नही देखी जाती। केवल सबको अपनी बात रखने के लिए मौका देना होता है और सारांशतः जो भी उचित निर्णय लगे वही सुनाना होता है।

लेकिन मेरे लिये आवश्यक था कि अपना निर्णय मुझे स्वयंको उचित लगे। मेरी विवेकबुद्धि, मेरी न्यायबुद्धि, उससे अलग हटना किसी शर्तपर मंजूर नही था। दूसरे उम्मीदवारोंको भी मौका देना पडेगा, उनकी बात कहनेका। उनके वकीलोंने कहा- यह दावा गलत है कि मामासाहब अपने अध्यक्ष पदको 'एन्जॉय' नही कर रहे, क्योंकि इनका टेलिफोन बिल, मेडिकल बिल भी कॉर्पोरेशन देती है और ये कार्पोरेशनकी कार भी इस्तेमाल करते हैं- आप चाहें तो कारका लॉग बुक मंगवा कर देखें। बाकी खर्चोंके अकाऊंट भी देखें। वैसे अध्यक्षके नाते उनको ये हक है। लेकिन फिर वे 'इन्जाईंग' की व्याख्यामें आ जायेंगे।

मैंने अपना निर्णय एक दिनके लिये रोक दिया जिसकी अनुमति होती है। और कार्पोरेशनको आदेश भेजा कि सारे कागजात मेरे सामने हाजिर करें।

उस शाम कलेक्टरने मुझसे कहा - नियम है - चुनावी अधिकारी अपनी विवेक बुद्धिसे निर्णय करे, तो दूसरा कोई क्या कहेगा। एक अन्य वरिष्ठ अधिकारीने मुझे कहा - नामांकन मंजूर करें, दिग्गजोंकी यही कहलवाया है कि असली चुनाव जनताको करने दें। दोनोंके लिये मेरा एक ही उत्तर था - सर रेकॉर्ड तो आने दीजिये।

अगले दिन निर्णय सुनने के लिए बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई। कागजपत्र बता रहे थे कि वेतन न लेते हुए भी मामासाहब उन सारी सुविधाओंका लाभ उठाते थे जो अध्यक्षके नाते उन्हें मिली हुई थीं। अर्थात एन्जॉय शब्द उनपर लागू हो रहा था। उनका नामांकन रद्द हो गया। उनके डमी कॅन्डिडेटका नामांकन स्वीकृत हो गया। लेकिन चुनावमें कांग्रेस वह सीट हार गई।

मामासाहबने हाईकोर्टमें अपील भी की लेकिन हाईकार्टने मेरे निर्णयमें कोई परिवर्तन करनेसे मना कर दिया। बहुत बादमें एक बार मामासाहबने अपने मनकी खुदबुद मेरे सामने कह डाली- आखिर वह समरी इन्क्वायरी थी, आप कागजपत्र देखनेसे मना करतीं तो मेरा नामांकन स्वीकृत हो जाता और मैं जीत जाता। आपने जानबूझकर मुझे हराया। मैंने कहा- समरी इन्क्वायरीका अर्थ यह नही कि कुछ भी मत देखो- उसका अर्थ यही है कि अपनी तसल्ली लायक कागज मिल जायें तो बाकी निर्णय अपने विवेकसे लो। आखिर आप भी अण्णासाहबकी तरह पहले ही पदत्याग करते तो यह नौबत नही आती। खैर! मामासाहब तो पिंपरी चिंचवड कार्पोरेशनके अध्यक्ष बने रहे लेकिन पुणेके अधिकांश दिग्गज कांग्रेसी नेता मुझसे रूष्ट ही रहे, वो आजतक।

महाभारतमें यक्षप्रश्न नामसे एक प्रसंग है। राज्यसे च्युत पांडव वनवास झेल रहे होते हैं। एक बार शिकारके कष्टमें सारे चूर होनेपर सहदेव पानी लाने जाता है, पर यक्षकी चेतावनी न माननेसे मृत हो जाता है। एक एक कर चार भाईयोंमेंसे कोई नही लौटता तो युधिष्ठिर स्वयंं उस सरोवरपर आता है। यक्ष उसे भी कहता है कि खबरदार मेरे प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना पानीको हाथ न लगाना। एक ओर प्यास व थकानसे बुरा हाल, दूसरी ओर सामने पडे चारों मृत भाई। फिर भी युधिष्ठिर शांतीपूर्वक यक्षके कूटप्रश्नोंके समुचित उत्तर देता है। प्रसन्न होकर यक्ष कहता है -- चल तेरे एक भाईको वापस जीवित करता हूँ, बता किसे करूँ। युधिष्ठिरका उत्तर है नकुल और यक्ष अचरजमें भरकर पूछता है-- मति मारी गई क्या तेरी, भीम या अर्जुनको माँगा होता तो युद्धमें राज्य वापस पानेकी संभावना बची रहती।

युधिष्ठिरका उत्तर था - नही, राज्य वापस मिले न मिले, मेरी न्यायबुद्धि बनी रहे। मेरे पिताकी दो पत्नियाँ थीं। आज कुन्तीपुत्र मैं जीवित हूँ, इसलिये यदि एक ही भाई वापस मिल सकता है तो एक माद्रीपुत्र भी जीवित रहे यही न्याय है। जीवनमें न्याय ही सर्वोपरि है।

उसकी न्यायबुद्धिसे प्रभावित होकर यक्षने चारों भाइयोंको वापस जीवित कर दिया। मेरी आदर्श कथाओंसे है यह प्रसंग। युधिष्ठिर भी मेरे आदर्शोंमें एक है जिसकी बुद्धिमें न्याय बसा हुआ था। न्यायके लिये जीवनकी सुखसुविधाएँ न्यौछावर करनेवाली इस कथाने जीवनमूल्यके रूपमें न्यायको चुननेमें मेरी मदद की है।

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Friday, October 4, 2019

गर्भनाल -९ नवम्बर २०१९ पुणेमें प्रांतसाहबीका पहला चरण


पुणेमें प्रांतसाहबीका पहला चरण

वह तिथी १० अगस्त १९७६ थी जिस दिन मैंने पुणे जिलेमें हवेली असिस्टंट क्लेक्टरका पद संभाला, उसे मैं प्रांतसाहबीका दूसरा चरण कहती हूँ। इससे पहले एक वर्षका प्रशिक्षण कार्यकाल भी पुणेमें ही पूरा किया था। वह एक और असिस्टंट कलेक्टरीके दो वर्ष, ये भारतीय प्रशासनिक सेवाके सबसे कनिष्ठ श्रेणीके वर्ष होते हैं और जिम्मेदार अफसर बनने हेतु अच्छे स्कूलका काम करते हैं। इस पोस्टका नाम भी जबरदस्त है- असिस्टंट कलेक्टर या सब-डिविजनल ऑफिसर और साथमें सब-डिविजनल मॅजिस्ट्रेट भी। लेकिन महाराष्ट्रके ग्रामीण इलाकोंमें 'प्रांतसाहेब' अधिक परिचित संबोधन है। एकेक जिलेमें तीन या चार प्रांतसाहेब होते हैं। उनका काम और अधिकार कक्षा कलेक्टरके कामसे काफी अलग, काफी सीमित क्षेत्रोंमें लेकिन वाकईमें धरातलसे जुडे होते हैं।

ब्रिटिश राजके दिनोंसे ही पटवारी, मंडल अधिकारी, तहसिलदार, सब-डिविजनल ऑफिसर, कलेक्टर और कमिश्नर जैसी अधिकारियोंकी एक सुदृढ शृंखला बनाकर उनके मार्फत जमीनके प्रशासनसे संबंधित सारे कार्य निपटाये जाते थे। जमीनी व्यवहारोंका लेखा जोखा ब्रिटिशोंसे पहले भी मुगलोंके, निजामके, शिवाजीके और पेशवेकालीन महाराष्ट्रमें रख्खा जाता था। इसके लिए जोशी, कुलकर्णी, सरदेशमुख जैसे पद भी नियत थे। भूमिका कर उन्हींके मार्फत वसूला जाता और सरकारी खजानेमें जमा होता। बंगाल-बिहार आदिमें कर वसूलने के लिए जमींदार और चौधारियोंकी प्रथा थी। लेकिन कोतवाली अधिकार उनके पास नही थे। ब्रिटिश राजने जमीनके कामोंके साथ जिला प्रशासनसे जुड़े सभी कामोंको कलेक्टर संज्ञक एक ही पोस्टमें एकत्रित कर दिया। चाहे जमीनकी नाप-जोत करनी हो, चाहे खसरा-खतौनीके पट्टे बनाने हों, चाहे भूमिकर वसूलना हो, चाहे वसूली गई रकमका हिसाब रखना हो, कभी सूखा पड़ जाए तो भूमिकर या लगान माफ करनी हो, या नई जमीनको कृषि-उपयोगमें लाने हेतु उसकी नाप-जोत कर लगान तय करना हो, चाहे उत्तराधिकार तय करना हो, जमीनसे उत्पन्न झगड़े बखेडे निपटाने हों या कभी जमीनके कारण अपराध, दंगे हो रहे हों और उन्हे सख्तीसे रोकना हो- सारे कार्य उस एक अधिकारीकी - कलेक्टरकी कार्य कक्षामें थे जिसे सरकारी खजानेको भरा पूरा रखनेका उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उन दिनों भूमिकर और जंगल संपदा ही सरकारी खजानेकी आयका प्रमुख साधन थे। अतः जिलास्तरपर कलेक्टर ही ब्रिटिश राजका प्रतिनिधि और सर्वेसर्वा होता था। हर वर्ष होने वाली फसलका हिसाब वही रखता था। जिला ट्रेझरी उसीके अधीन थी। दो विश्वयुद्धोंके कारण जब राशन व्यवस्था लागू करी गई तो उसका मुखिया भी कलेक्टर ही था। इसके अलावा हर जिलेका हर वर्षका गजेटियर बनानेका काम उसीका होता था। जो कलेक्टर अच्छा लिख सकते थे उन्हें प्रशासनके उपयुक्त अच्छी पुस्तकें लिखनेके लिए प्रोत्साहित किया जाता था। दंगे हुए, झगड़े हुए तो उनका सीधा असर लगान वसूली और सरकारी तिजोरी पर पड़ता था। अतः दंगेकी रोकथाम सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती। इसी कारण जिला पुलिस अधीक्षक कलेक्टरके अधीन ही होता था और क्रिमिनल प्रोसिजर कोडके कई सेक्शन जिला मॅजिस्ट्रेटकी कचहरीमें ही चलाए जाते।

इन सब कामोंमें कलेक्टरका बाँया और दहिना- दोनों हाथ होते थे सब डिविजनल ऑफिसर अर्थात प्रांतसाहेब ! पहले दौरमें कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक गोरे अफसर हुआ करते थे। लेकिन अधिकांश प्रांतसाहेब देशीय लोग होते। धीरे धीरे जब आयसीएसमें हिन्दुस्तानी लोग आने लगे तो प्रांतसाहबोंको भी कलेक्टरका प्रमोशन दिया जाने लगा। स्वतंत्रताके पश्चात आईएएस या भाप्रसे बनी। उसके अफसरोंको भी पहले दो वर्ष प्रांतसाहबीमें लगानेका सूत्र कायम रहा। कलेक्टर और प्रांतसाहबकी जो प्रतिमा अंग्रेजोंके शासनमें जन-मानसमें बैठी हुई थी, वह भी अधिकतर कायम ही रही। हालाँकि उनके अधिकार और कामोंमें काफी अंतर भी पड़ा। फिर भी ग्रामीण प्रशासनमें उनकी भूमिका आज भी करीब करीब वही है, और उनका रूतबा भी।

प्रांतसाहबीकी पहली पोस्टिंगके कारण नए भाप्रसे अफसरको ग्रामीण अंचलोंमें भरपूर काम करना पड़ता है, और वही नींव है इस बातको सीखनेकी कि प्रशासनका असर छोटेसे छोटे आदमीतक किस रूपमें पहुँचता है।

मेरी पूरी पढाई हुई थी बिहारमें। केवल गर्मीकी छुट्टियोंमें महाराष्ट्रके अपने छोटेसे गाँव धरणगाँवमें जाते थे। मेरा महाराष्ट्र-परिचय बस उतना ही था। मेरी आईएएसकी परीक्षाएँ चल रही थीं कि शादी तय हुई। इधर रिझल्ट आया, उधर शादी। फिर प्रकाशकी पोस्टिंग थी कलकत्ता और मेरी ट्रेनिंग थी मसूरीमें - वहाँ आठ महीनोंके बाद ऑर्डर आई कि मुझे महाराष्ट्र काडर अलॉट किया गया है। इसका अर्थ हुआ कि मेरी अगली सारी नौकरी महाराष्ट्रमें होगी और कभी कभार दिल्लीमें। प्रकाशको ट्रान्सफरके लिए दो पर्याय थे- पुणे या मुंबई। हमने पुणेमें बस जानेका निर्णय लिया।

मसूरी ट्रेनिंगके बाद मुझे अगले एक वर्षके जिला ट्रेनिंगके लिए भी औरंगाबादकी पोस्टिंग बदलकर पुणेमें मिल गई थी। इस प्रकार ट्रेनिंगके लिये मैं १९७५ में ही पुणे आ गई। मेरी समस्या जानकर जिस तत्परतासे श्री कपूरने सुझाव दिया व श्री साठेने मेरी पोस्टिंग बदल दी, वह वर्क एफिशियंसी मेरेलिए हमेशा रोल मॉडेलके रूपमें रही।

उस जमानेमें सभी सिनियर अधिकारी अपने ज्यूनियर्सके साथ बहुत अपनापन रखते थे। आजके अफसरोंके बीच यह अपनापन लुप्तसा होता जा रहा है। ध्यान देनेकी बात है कि पूरे भारतका प्रशासन चलानेके लिए ब्रिटिशोंके पास केवल दो तीन हजार आईसीएस अफसर थे। आज भी केवल पांच हजारके करीब हैं। यदि उनमें अपनापन नही हुआ तो प्रशासन भरभराकर टूट सकता है। इसीलिए ब्रिटिशोंके दिनोंमें हर सिनियर अफसरकी जाँच इस बातपर होती कि वह अपने ज्यूनियर्सके लिए कितना अपनापन दिखाते हैं, उनकी शिक्षा दीक्षामें कितनी जिम्मेदारी निभाते हैं। कोई सिनियर ऐसा नही करे तो उसके सिनियर्स उसका काऊन्सेलिंग करते थे। इस बातसे हमें कुछ सीखना चाहिये।

इस प्रकार मेरे प्रशिक्षणका एक वर्ष और पोस्टिंगके दो वर्ष पुणेमें बीते और मेरा रूतबा रहा प्रांतसाहबका । बिहारकी तुलनामें और धरणगाँवकी तुलनामें भी पुणेमें और सरकारी नौकरीमें सब कुछ अलग ही था।

महाराष्ट्रके भूगोलमें उत्तरसे दक्षिण सह्याद्रिका पठार और घाटियाँ हैं। घाटमाथे पर उत्तरसे दक्षिण क्रममें पडने वाले जिले हैं नासिक, नगर, पुणे, सातारा, सांगली, कोल्हापुर। कोल्हापुर आते आते पठारकी ऊँचाई समाप्त हो जाती है। उससे दक्षिण बेलगांव तो बिल्कुल तलछटीमें है। सह्याद्रिके पश्चिममें कोंकण प्रदेश है। उधरसे सहयाद्रिको देखो तो वह एक दुर्गम, आकाशगामी दीवारकी तरह दीखता है। दीवारसे नीचे बसा कोंकण, बमुश्किल बीस'तीस किलोमीटर चौड़ाईका है, और फिर तत्काल समुद्र। लेकिन घाटमाथेके इस ओर अर्थात पूर्वी इलाकेका दृश्य बिल्कुल अलग है। यहाँ पश्चिमसे पूर्व पहाड़की ऊँचाई धीरे धीरे कम होती है। घाटमाथेकी नदियोंका पानी पूर्वकी तरफ बहता है। सो सह्याद्रिके पूरबके नगर, पुणे, सातारा, सांगली, कोल्हापुर जिले पश्चिम महाराष्ट्र कहलाते हैं। यह सारा प्रदेश पानीसे भरपूर, बारहों महीने हरा भरा, सालमें दो या तीन फसलों वाला है। सम्पन्न। यही वर्णन पुणेके उन सात तहसिलोंमें लागू होता है जो पूरबकी दिशामें पहाड़से थोड़ा नीचे उतर चुके हैं। लेकिन घाटमाथेके सात तहसिल तो मावली थे। दुर्गम काले पहाड़ोंमें बसे, जहाँ वर्षमें आंबेमोहोर नामक सुगंधी धानकी एक फसलके सिवा कोई फसल नही उगती थी। रास्ते बनाना दूभर। हाँ, घासके कारण पशुधन अच्छा होता है। इन तहसिलोंमें आदिवासी संख्या बडी मात्रामें है।

पश्चिम महाराष्ट्रके पूरबमें मराठवाडा, उत्तरमें खानदेश, और उससे उत्तरमें विदर्भ क्षेत्र हैं। हर क्षेत्रकी मराठी एक दूसरेसे ऐसी अलग है कि किसीकी बोली सुनते ही ज्ञात हो जाता है कि उसका क्षेत्र कौनसा है। मराठीके एक मूर्धन्य साहित्यकार दांडेकरजी अपने उपन्यासमें जिस क्षेत्रकी पृष्ठभूमि हो, उसी इलाकेकी मराठीका प्रयोग करते थे। उस उस टोनमें मराठीको सुनना मुझे बहुत भाता है।

मैं औरंगाबादसे पुणे आई तब श्री सुब्रहमण्यम् कलेक्टर थे। औरंगाबादकी तुलनामें पुणे बहुत बडा और राजनीति चलानेवाला शहर था। यहाँ मंत्रियोंका तांता लगा रहता था, सो भागवतजीकी तुलनामें श्री सुब्रह्मण्यम् कम ही समय दे पाते थे। वे ओशोको बहुत पसंद करते थे और अक्सर उनके साथ टूर जानेपर वे ओशोकी सीखोंको सुनाते थे। मैं स्वयं ओशोको अधिक पसंद नही करती लेकिन उनके कारण ओशोके कई विचारोंसे परिचय हो गया।

एक बार मैं उनके दफ्तरमें बैठी थी। वे डाक देख रहे थे। एक अर्जी निकालकर मुझे पढनेके लिए दी। फिर पूछा - इस अर्जीकी सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है, जो याद रखनी चाहिये? मैंने कहा - इस प्रार्थीकी कोई जमीन सरकारने अधिग्रहणकी है और उचित मुआवजा नही दिया है, यही मैं याद रखूँगी। वे हंसकर बोले - नो, नो। यह याद रखा करो कि इस आदमीका नाम क्या था, संभव हुआ तो गांव भी। देखो, हमारे लोग इस अर्जीको चार महीने वैसे ही रख लेंगे, कुछ नही करेंगे। यह आदमी मुझसे मिलने आयगा। जब मैं कहूँगा, हाँ हाँ तुम्हारा नाम, गांव यह है, मैंने तुम्हारी अर्जी देखी है, तो उसे तसल्ली होगी कि चलो काम नही भी हुआ तो क्या? मेरा नाम तो साहबने याद रखा हुआ है।

मैं अचकचा गई। मेरे लिये यह महा कठिन बात है कि मैं किसीका चेहरा या नाम याद रख सकूँ। उनकी बातकी प्रचीति भी मैने देखी। दौरेपर कई लोग उनसे मिलने आते तब मैं देखती थी कि उन्हें याद रहता था कि कौन पहले भी उनसे मिल चुका है और उनके बतानेपर तत्काल उस व्यक्तिका चेहरा खिल जाता है। यह कला मुझे आजतक नही आई। लेकिन एक संतोष यह है कि मुझे कामके डिटेल्स याद रह जाते हैं। अतः जबतक कोई आदमी कहता रहे कि मेरा नाम अमुक, गांव अमुक, तबतक उसे मेरे चेहरेपर एक प्रश्नचिह्न लगा दिखेगा। लेकिन जब वह कहेगा - मेरे पड़ोसीसे जमीनकी बाउंड्रीके झगड़ेकी बाबत फाइल चल रही है, तो मुझे याद आयेगा, हाँ और इसने बांधपर लगे दो खैरके पेड़ोंकी भी तकरार लिखी थी। तब जाकर उसे तसल्ली होती है कि अच्छा, इन्हें काम तो याद है।

मेरी इस याददाश्तका फायदा मैं ऐसे उठाती हूँ कि मैं हेडक्लर्कसे कह सकती हूँ - देखो, बाउंड्रीपर लगे पेड़ोंके झगडेकी बाबत सात अर्जियाँ आ चुकी हैं, जरा सबको एक साथ ले आओ और देखो कि क्या एक ही फार्मूला लग सकता है, यदि हाँ तो वही जनरल सकूर्यलर बनाकर सब पटवारियोंको भेज देंगे। फिर हमारे पास अर्जियाँ कम हो जाएंगी।

जिला प्रशासन मुख्यतः गाँवों और खेतीसे संबंधित होता है। ग्रामीण जमीन, खसरा खतौना आदिका हिसाब पटवारी रखता है। लगान वसूलीकर तहसील ट्रेझरीमें जमा करना उसीका काम है। गाँवके और भी कई तरहके हिसाब। यह सारे समुचित ढंगसे लिखे जायें और उनका इन्स्पेक्शन एवं ऑडिट भी ठीक ढंगसे हो, इसके लिये १९१५ में अँडरसन नामक एक अंगरेज आयसीएस अधिकारीने रेवेन्यू मॅन्यूअल लिखा जो बॉम्बे प्रेसिडेन्सीमें अर्थात्‌ महाराष्ट्र, गुजरात, सिंध, कराची और कर्नाटकमें लागू हुआ। यहाँकी रेवेन्यू सिस्टिम पूरे भारतमें सबसे अच्छी मानी जाती है। आज सौ वर्ष होनेके बाद भी उस व्हिलेज अकाऊंट-सिस्टिममें कोई परिवर्तन करनेकी आवश्यकता नही पड़ी। महाराष्ट्र केडरके प्रोबेशनर जब मसूरीके एक वर्ष ट्रेनिंगके बाद अपने राज्यमें एक वर्ष ट्रेनिंगके लिए आते हैं तो उन्हें इस मैन्यूअलसे सामना करना पड़ता है। इसलिये, कि वर्षके अंतमें जो परीक्षा होनी है, उसके बाकी सात पेपर्सके उत्तर तो पुस्तक देखकर लिखनेका रिवाज है लेकिन अँडरसन मॅन्यूअलका पेपर बगैर पुस्तकी सहायतासे लिखना पड़ता है। कई वर्षों बाद मैं पुणेमें सेटलमेंट कमिशनर बनी तो मेरे कार्यालयका एक कमरा दिखाते हुए जानकारोंने बताया कि वहाँ बैठकर ऍण्डरसनने अपना रेवेन्यू मॅन्यूअल लिखा था।

मॅन्यूअलमें बताया गया है कि पटवारी गाँवके हिसाब कैसे लिखे और कलेक्टर, प्रांतसाहेब या तहसिलदार उनका ए ऑडिट, अर्थात विस्तृत ऑडिट और बी ऑडिट अर्थात्‌ समरी ऑडिट कैसे करें। उन दिनों प्रांतसाहबको वर्षमें बीस ए ऑडिट पूरे करने होते थे। जिस प्रकार कोई अच्छा चार्टर्ड अकाऊन्टेन्ट किसी कम्पनीका ऑडिट कर उस कंपनीके स्वास्थ्य और व्यवहारकी ईमानदारीको जान लेता है उसी प्रकार अच्छा अफसर ए ऑडिटके माध्यमसे गाँवकी हाल चाल और पटवारीकी नियतको जान लेना है। एक अच्छा ए ऑडिट करनेके लिए छः घंटे और बी ऑडिटके लिए एक घंटा लग जाता है। उतना भी समय न हो तो कमसे कम विलेज फॉर्म नंबर छः, सात, बारह, एक, आठ और नौ तो देख ही ले। कमसे कम छः नंबरपर हस्ताक्षर तो कर ही दे ताकि पटवारी उसपर बॅकडेटेड एन्ट्री न कर सके आदि कई गुर हैं। मेरे प्रोबेशन कालमें सुबह एक बार कलेक्टरको अभिवादन कर लेनेके बाद मेरा समय अक्सर हवेली प्रांत अधिकारीके ऑफिसमें गुजरता था जो उसी कम्पाऊंडमें था। यह प्रांत अधिकारी खानोलकर अत्यन्त निष्णात थे और कई गुर मैंने यहीं सीखे। मैं अपना ए ऑडिट भी तीन घंटोंमें समाप्त कर पाती थी। कहना नहीं होगा कि जब अँडरसन मॅन्यूअलकी परीक्षा हुई तो उस पेपरमें मुझे डिस्टिंक्शनके मार्क आये। एक वर्षके बाद खानोलकरका तबादला हुआ पिंपरी चिंचवड नगर विकास प्राधिकारीके पद पर और मैं हवेली प्रांत अधिकारी नियुक्त हुई। पुणे शहरके बाहर जितने भी नए उद्योग लग रहे थे वे सब पिंपरी चिंचवड प्राधिकरणके गाँवोंमें लग रहे थे। इसीसे यहाँ नई नगर पालिका बनानेकी आवश्यकता आन पड़ी थी। उसीको मूर्त रूप देनेके लिए प्राधिकारीकी नियुक्ति हुई। वैसे यह हिस्सा मेरे ही कार्यकक्षामें पड़ता था। सो मेरी और खानोलकरकी मित्रता कायम रही।

इन्स्पेक्शनके समय वे बताते थे - सोचो कि इस इन्स्पेक्शनसे मैं क्या साध्य करना चाहता हूँ और बादमें अपनेसे पूछो- क्या मैंने वह साध्य किया। दूसरे अधिकारी गाँवके राशन दुकानका इन्स्पेक्शन करेंगे तो उसके रजिस्टरके कुछ पन्ने देख लेंगे, फिर कुछ खरीददारोंसे माँगकर रसीद देखेंगे और लिख देंगे अपने रिपोर्ट में-- दस रसीदें देखीं, दुकानदारका रजिस्टर देखा- बस। लेकिन खानोलकर अपनी रिपोर्टमें रसीद नंबर दर्ज करते थे और रजिस्टरके वह पन्ने भी जाँचते जिनमें इन्हीं रसीदोंकी काऊंटरफॉईल होती थी। साध्य क्या था- कि यदि दुकानदार बेईमानी कर रहा हो तो उसे पकड़ा जा सके। इसीलिए रसीदोंका मिलान रजिस्टरके संबंधित पन्नेसे होना चाहिए- इस बातका वे खूब ध्यान रखते थे।

फिर भी खानोलकर प्रौढ और कन्वेन्शनल अधिकारी थे जबकि खेड प्रांतमें गोपाल नामक मुझसे केवल दो वर्ष सीनीयर आईएएस अधिकारी प्रांतसाहेब थे। उनसे कुछ अलग बातें सीखीं।

एक बार कलेक्टरके साथ सभी तहसिलदार और प्रांत अधिकारियोंकी मीटींग चल रही थी कि मुंबईसे संदेशा आया कि खुद मिनिस्टर तथा रेवेन्यू सेक्रेटरी पुणे जिलेके कार्योंका जायजा लेनेके लिये अगले दिन मीटींग करेंगे। बस, कलेक्टरने अपना अजेंडा रोक दिया और अगले दिनकी तैयारीके लिए सबको सूचनाएँ दीं। मैं, गोपाल, खानोलकर सभी हवेली प्रांतके दफ्तरमें आए। गोपालने हमारे हेड क्लर्कसे कहा- मेरे खेडके ऑफिसमें फोन मिलाओ। फिर करीब पंद्रह मिनटतक अपने हेड क्लर्कको सूचना देते रहे कि कलकी मीटींगके लिये इस मुद्देका रिपोर्ट चाहिये, वह चार्ट चाहिए, उस मुद्देको ऐसे लिखना है इत्यादि, अब आप लोग दिन रात बैठकर रिपोर्ट बनाइए और सुबह बस पकडकर पुणे पहुँचिए, मैं यहीं रूक रहा हूँ। जब गोपालका फोन खतम हुआ तो खानोलकरने अपने हेड क्लर्कसे कहा - यह जो सारा अभी सुना, वही तुम्हें भी करना है - मैं अब अलगसे कोई सूचना नही देता। हेड क्लर्क भी पुराना खिलाड़ी था - उसने अपनी नोटबुक हमारे सामने रखी। मैंने आश्चर्यसे देखा - जब गोपाल अपने हेड क्लर्कको सूचना दे रहे थे, तब ये सज्जन भी उसे लिखते जा रहे थे।
इस घटनासे मैंने सीखा कि कहीं भी रहनेके बावजूद अपने ऑफिसपर रिमोट कण्ट्रोल कैसे किया जाता है।

एक बार कलेक्टर सुब्रह्मण्यम् खेड प्रांतके दौरेपर जाने लगे तो मुझे भी साथ ले गए - जानेके लिए उनकी कार थी। लेकिन जिन गाँवोंमे उन्हें इन्स्पेक्शन करना था, वहाँ कार नही चल सकती थी। जीपका ही सहारा था। उन दिनों सरकारी कार्यालयोंमें गाडियाँ नहीके बराबर होती थी। खेड जैसे दूरस्थ गाँवमें केवल एक प्रांत अधिकारीकी जीप अर्थात गोपालकी। हमारे दलके साथ जानेवालोंमे पटवारी, मंडल अधिकारी, कलेक्टरका सिपाही इत्यादि भी मौजूद थे।

हम लोग जीपकी तरफ बढने लगे तो गोपालने कहा- मैं ड्राइव करूँगा, कलेक्टर साहब बीचमें और लीना, आप किनारेपर बैठना। बाकी सब लोग पीछे बैठेंगे। बादमें धीरेसे मुझसे कहा- कभी भी सिनियर्सके साथ दौरा करना पडे तो खुद ड्राइविंग करना, वरना पीछे बैठना पड सकता है। फिर सिपाही, पटवारियोंपर रोब नही रहता। लेकिन सिनियर्सको कैसे विश्वास हो कि आप अच्छा ड्राइविंग कर लेती हो? इसलिये बाकी समय भी खुद ही ड्राइविंग किया करो ताकि कलेक्टरके कानमें यह बात जाती रहे कि आपको ड्राइविंग आती है।

बादमें जब मैं प्रांत साहब बनी तब सुब्रहमण्यम बदल चुके थे और नए कलेक्टर अफझुलपुरकर आ गए थे। मुझे हंसी आती है कि एक बार मेरे विभागमें अफझुलपुरकर इन्स्पेक्शन करने आए और मैं जीपमें ड्राइविंग सीटपर बैठने लगी तो उन्होंने रोक दिया। कहा - मैं ड्राइव करूँगा, तुम उधर दूसरी तरफ बैठो। बादमें कहने लगे - मैंने सुना है कि तुम भी अच्छा ड्राइव कर लेती हो, लकिन मुझे भी आज कई वर्षोंबाद जीप ड्राइविंगका मौका मिला है। इस प्रकार कलेक्टरपर अपनी ड्राइविंगकी धाक जमानेका मेरा मौका चूक गया।

मेरे प्रोबेशनर कालमें मेरे लिये अत्यंत आदर्शवत् एक घटना हुई। तब देशमें एनएसए (नॅशनल सिक्यूरिटी ऍक्ट) लागू था। लेकिन श्री जयप्रकाश नारायणके नेतृत्वमें आंदोलन भी जोर पकड रहा था। श्री अटलबिहारी बाजपेयी पुणेके पास तलेगाँवमें आनेवाले थे। अपने ओजस्वी भाषणोंके कारण वे स्टार वक्ता थे। मैं पहले भी बिहारमें उनके भाषण सुन चुकी थी। संयोग कि खानोलकर छुट्टीपर थे तो कलेक्टरने मुझसे कहा कि तलेगाँव पीएसआयको साथ ले जाओ और भाषण सुन आओ। मैंने इसके राजनीतिक पहलूपर गौर किये बिना भाषण सुना और एक अच्छा भाषण सुननेका आनन्द लेकर घर आ गई।

अगले दिन ऑफिस आई तो पाया कि मुंबईसे दबाव बन रहा था कि भाषणमें उल्लेखित कुछ अंशोंके आधार पर अटलजीको गिरफ्तार किया जाय और उन पर एनएसए (नॅशनल सिक्यूरिटी ऍक्ट) लगाया जाय। सामान्यतः पुलिस किसीको कैद करती है तो चौबीस घंटेमें उसे न्यायालयमें जजके सम्मुख ले जाना पुलिसके लिये अनिवार्य है। लेकिन एनएसएमें यह समयसीमा छह महीनेकी थी। इंटरप्रिटेशनका पूरा हक कलेक्टरको सौंपा हुआ था। लेकिन एक्टमें यह निर्देश था कि कलेक्टर अपनी विवेकबुद्धिका उसी प्रकार प्रयोग करे जैसे कोई सुयोग्य जज करता है। साथ ही कलेक्टरका निर्णय ही अंतिम था। उस निर्णयमें सरकारके वरिष्ठ अधिकारियोंकी कोई दखल संभव नही थी।

उस एक दिनमें दसियों बार कलेक्टरके लिये मुंबईसे फोन व दबाव आते रहे। तीन बार कलेक्टर और जिला-पुलिस-अधीक्षक चर्चाके लिये बैठे। प्रोबेशनर होनेके नाते मुझे भी विशेष अनुमति थी वहाँ बैठनेकी। लेकिन एक और भी कारण था। कलेक्टर सुब्रह्मण्यम् और पुलिस अधीक्षक सिंगारवेलू दोनों ही दक्षिण भारतीय थे। मराठी तो बोल समझ लेते थे लेकिन अटलजीवाली हिंदी उनके लिये क्लिष्ट थी। उन दिनों भाषण रिकार्ड करनेकी कोई सुविधा नही होती थी। किसी पुलिस कॉन्सटेबलकी ही डयूटी लगती थी कि वह भाषणको जल्दी जल्दी लिखता रहे। लिखनेवाला कॉन्सटेबल मराठी - जितनी हिंदी उसके पल्ले पडी उतनी ही उसने लिखी। उसकी हैंडराइटिंग भी मराठी स्टाइलकी थी। लेकिन कलेक्टरके लिये वही डॉक्यूमेंटरी एविडंस था न कि समाचारपत्रोंमें वर्णित बातें।

ब्रिटीश कालसे ही कलेक्टरको हर महीने एक सिक्रेट कोड भरा सील्ड लिफाफा भेजा जाता है। उस महीनेमें आने वाले गुप्त संदेश इस कोडमें लिखित कुंजीकी मददसे पढे जा सकते हैं। जरूरत न पडनेपर कलेक्टर स्वयं हर महीने उस सील्ड लिफाफेको जला देता है और सरकारके पास रिपोर्ट करता है। नया कोड भी समयानुसार पहुँच जाता है। यह सब मैंने तब सीखा और आगे कलेक्टर बननेपर निभाया भी।

तो टेलीप्रिंटरपर तीन बार गुप्त संदेश आये कि भाषणके अमुक अंशको अमुक तरीकेसे इंटरप्रेट किया जा सकता है, और उस आधारपर अटलजीकी गिरफ्तारी सही ठहराई जा सकती है। तीनों बार अलग अलग वाक्यांशोंका हवाला था। हर बार कलेक्टर और अधीक्षककी बात लम्बी चली। उस कॉन्सटेबलके लिखकर लाये भाषणका हर शब्द बार बार पढा गया, हर शब्द पर चर्चा हुई। मुझसे भी अत्यल्पतामें अर्थ पूछ लेते थे, लेकिन अन्तिमतः निर्णयका उत्तरदायित्व उनका ही है यह भान उन्हें था। मैंने हिंदी भाषण सुना था और अपनी हिंदीकी पकडके आधारपर कह सकती थी कि अटलजीने एनएसएका भान रखते हुए ओजस्वी, फिर भी संतुलित भाषण दिया था। परन्तु अब तो यह गौण था कि वाकई भाषण क्या था - जो ट्रान्सस्क्रिप्ट लिखित रूपमें सामने है, उसीको फाईलमें लगना था, यह भेद भी मैंने उस दिन सीखा।

तो कुल मिलाकर दोनोंकी तीन बार मीटींग हुई औऱ हर बार मुझे बुलाया गया। भाषणका हर वाक्य कई कई बार पढा गया, और दोनों हर बार इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि 'विवेकबुद्धि' से मीनमेख करनेके पश्चात् वह भाषण एनएसए लगानेके लिये पर्याप्त नही था। मेरे लिए यह घटना एक अच्छा पाठ था कि कैसे एक विवेकशील अधिकारी अपनी सच्चाईपर अडिग रह सकता है। उन दिनों शेषनके कार्यकाल जैसा निर्वाचन आयोग नही था। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक दोनोंके लिये कभी भी ट्रान्सफर ऑर्डर आ सकता था। फिर भी दोनों दबावमें नही झुके।

इस घटनाको याद करती हूँ तो वह कमरा, वह ट्रान्सस्क्रिप्ट, वह गुप्त कोडवाले लिफाफे, वह बालकी खाल निकालकर किया गया प्रत्येक शब्दका परीक्षण, पिछली शाम भाषण देता हुआ अटलजीका चेहरा आँखोंमें कौंध जाता है। और अफसरीके उत्तरदायित्वके सम्मानमें मैं स्वयंके लिये भी गौरवकी अनुभूति करती हूँ।
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